इस विषय पर लिखने का इरादा नहीं था। मगर एक ऐसी खबर आई जिसकी वजह से मैं अपने आपको रोक नहीं सका। अभी कुछ दिन पहले ३१ मई को दिल्ली में रामलीला मैदान में कुछ मुस्लिम जमातें और कुछ अमन-पसंद लोग एक रैली में शरीक हुए और कुरान व हदीस का हवाला देते हुए आतंकवाद की बढ़ती आग की सख्त निंदा की। कहा गया कि इस्लाम आतंकवाद के खिलाफ है। आतंकवाद से लड़ने के लिए इसने जन्म लिया है।
फतवे में यह भी कहा कि हर मुसलमान को यह ताकीद करते हैं कि इस आतंकवाद के खिलाफ की इस जंग में सब शामिल हो जाएं। यह एक बहुत अच्छी शुरुआत है और इसकी आवाज बहुत दूर तक पहुंचेगी और सुनाई देगी। इससे पहले भी कई फतवे दिए गए हैं। वो क्यों और कहां से आए, यह जानना मुश्किल है, इसलिए कि मुसलमानों में भी कई जमातें हैं। किसको फतवा देने का इख्तियार है, वो इख्तियार किसने दिया है-उसकी क्या अहमियत है वो जानना भी इतना ही मुश्किल है। मगर इस फतवे की अहमियत इसलिए है क्योंकि यह सबने मिलकर दिया है और कुरान व हदीस के हवाले से दिया है।
पिछले साल मेरे बेटे सलमान खान को मुंबई में लालबाग के गणपति मंडल से गणपति उत्सव में शामिल होने की दावत दी गई। सलमान वहां गया और शाम की आरती में शामिल हुआ। उसको बार-बार कई टीवी चैनलों ने दिखाया भी। बस फिर क्या था, दूसरे दिन फतवों की बारिश शुरू हो गई और वर्डिक्ट दिया गया कि आज के बाद सलमान मुसलमान नहीं है। उसे इस्लाम से निकाला जाता है। मैं पूछता हूं कि इससे पहले उसे इस्लाम में दाखिल किसने किया था और कब किया था, जो यह मेम्बरशिप खारिज कर दी गई?
क्या यह लोग जानते हैं कि उसकी मां एक महाराष्ट्रीयन हिंदू हैं और सलमान का एंबिलिकल कार्ड उसकी मां के धर्म से जुड़ा हुआ है। उसकी मां अपने घर से रुखसत लेकर इस घर में आई तो जरूर, मगर अपने मां-बाप, भाई-बहन, रिश्तेदार और अपने धर्म को छोड़कर नहीं। सलमान ने अपनी मां के धर्म की इज्जत करना उसकी गोद में सीखा है। यही हर मजहब सिखाता है। मुझसे किसी ने पूछा- आप लोगों का आखिर मजहब क्या है? मैंने बताया कि जब कार का जोर से ब्रेक लगता है और हम किसी खतरनाक एक्सीडेंट से बाल-बाल बचते हैं, तो मेरे मुंह से बेसाख्ता निकल जाता है-अल्लाह खैर। मेरी बीवी के मुंह से निकलता है-अरे देवा। और मेरे बच्चों के मुंह से साथ-साथ निकलता है-ओह शिट। यही हमारी फैमिली के नेशनल इंटीग्रेशन का एक छोटा सा फामरूला है।
इस्लाम के माने हैं अमन और शांति। भला बताइए कि जिस मजहब में मिलने पर अस्-सलामो-अलैकुम कहा जाता है, और जवाब मिलता है वालेकुम-अस्-सलाम यानी खुदा तुम्हें शांति से रखे और प्रोटेक्ट करे, वो क्या वायलंट मजहब हो सकता है? बिस्मिल्लहा इर्र रहमान निर्र रहीम माने है शुरू करता हूं उस खुदा के नाम से जो रहमान है, रहम करने वाला और मेहरबान है मेहरबानी करने वाला। इस मजहब में आतंकवाद कहां से और क्यों आ गया? उसकी वजह है गलत तालीम। दुनिया में हर मुसलमान अपने मुल्क के संस्कारों से जुड़ा हुआ है।
चीन का मुसलमान चीनियों की तरह रहता है। उसका खाना-पीना, रहन-सहन सब चीनियों की तरह है। इसी तरह मलेशिया का मुसलमान और इसी तरह रशिया का मुसलमान देखने में रशियन लगते हैं। सिर्फ हिंदुस्तान के मुसलमान ने अपनी एक ऐसी पहचान बनाई है जिसका मूल कहां से है, वो आज तक समझ में नहीं आया और इसलिए इस देश में वो अलग नजर आता है।
एक पूर्व विदेश मंत्री सलीम शेरवानी ने मुझसे एक दिन कहा कि मुसलमान की पहचान अब उसका अमल नहीं है बल्कि उसकी पहचान है छोटे भाई का पायजामा और बड़े भाई का कुर्ता। दाढ़ी रखना सुन्नत है मगर बेतरतीब दाढ़ी नहीं। ये वो जो कपड़ा पहनता है उस हुलिए का इस्लाम में कोई जिक्र नहीं। किताबों में यह कहा गया है कि कपड़ा साफ-सुथरा और शाइस्ता होना चाहिए, जो बदन को अच्छी तरह ढंक सके। यही तो हमारे हिंदुस्तान में लिबास रहा है। आज भी गोल्डन टेम्पल में सिर को ढंक के ही जाना पड़ता है।
इस्लाम में अमल यानी करम की बहुत ताकीद की गई है। यह भी कहा गया है कि जन्नत में उसको अपने आमाल पहुंचाएंगे नमाज या रोजे नहीं। एक बिजनेसमैन है जिन्हें मैं अच्छी तरह से जानता हूं। दोस्त बनने या बनाने के काबिल नहीं हैं, इसलिए कि सारे दोस्तों को ही इन्होंने अपना शिकार बनाया है। रेग्युलर नमाज पढ़ते हैं, रोजे रखते हैं, हज भी कर आए हैं, मगर जब भी मुंह खोलते हैं झूठ ही निकलता है।
दो लाख का फ्रॉड करके अगर मुंबई से आ रहे हैं तो मरीनड्राइव पर ब्रिज के नीचे रुककर दो किलो ज्वार खरीदकर कबूतरों को खिला देते हैं जिसकी वजह से कबूतर इतने मोटे हो गए हैं कि अब उनसे उड़ा भी नहीं जाता। बेईमानी का पैसा इंसान तो छोड़िए कबूतरों से भी उनकी उड़ान छीन लेता है। इस महीने की २ तारीख को पाकिस्तान में बम ब्लास्ट हुआ। ४क् से ५क् लोग मारे गए और कई जख्मी हुए।
ब्लास्ट की वजह थी किसी डेनिश अखबार ने प्रोफेट मोहम्मद की कुछ गलत तस्वीरें छापी थीं जो काटरून की शक्ल में थीं। जिन लोगों का उन तस्वीरों से कोई ताल्लुक नहीं था, वो बेगुनाह मारे गए। मारने वाला था एक मानव बम। खुदकुशी को इस्लाम में हराम मौत करार दिया गया है। खुदकुशी करने वाले के जनाजे को भी कंधा देना मना है। इस खबर को पढ़कर एक कहानी याद आती है। एक ट्रेन में एक अंधा शख्स जिसे बिलकुल नहीं दिखता था, सफर कर रहा था। ट्रेन का डिब्बा पूरी तरह भीड़ से भरा हुआ था। भीड़ में उसकी एक आदमी से तू-तू, मैं-मैं हो गई। उस आदमी ने अंधे को एक थप्पड़ मार दिया। अंधे को गुस्सा आया, अपनी जेब से भरी हुई पिस्तौल निकाली और ६ गोलियां चलाईं जिसकी वजह से छह यात्रियों की मौत हो गई- मगर उन मरने वालों में वह आदमी नहीं था जिसने उसे थप्पड़ मारा। इस कहानी का नाम है- ‘ब्लाइंड रेइज’।
मैं एक मौलवी को जानता हूं जिनका यह ख्याल है कि जन्नत में सिर्फ कलमा पढ़ने वाला मुसलमान ही दाखिल होगा। यह करोड़ों, अरबों, बाकी के जो लोग हैं वे फिर कहां जाएंगे। वो कहते हैं हमें क्या मालूम वो खुदा जानता है। अगर अच्छे अमल करने वाले गैर-मुस्लिम क्या जन्नत में दाखिल नहीं हो सकेंगे? फिर वही जवाब, हमें क्या मालूम वो तो खुदा जानता है। जितना हम जानते हैं, उतना ही बताने की हिदायत है। मैंने उनको एक बहुत बड़ी समस्या में डाल दिया।
कुछ दिन पहले ‘सिरोक’ के पीछे समंदर के काफी अंदर एक मुसलमान लड़का और एक मुसलमान लड़की हाई टाइड में बुरी तरह फंस गए। मोहन रेडकर नाम का एक जवान लड़का जो अपनी मां को रिपोर्ट देने बांद्रा आया था, टहलते हुए समंदर की तरफ चला गया और इन दोनों मुसलमान बच्चों को बचाने में अपनी जान दे दी। जब भी यह दोनों पूरी उमर तय करने के बाद इस दुनिया से रुखसत लेंगे तो उन्हें कैसा लगेगा? हमारे बचाने वाले को जन्नत के दरवाजे पर रोक दिया? क्या वो ऐसे जन्नत में जाना पसंद करेंगे, जो इतनी बेइंसाफी से मिलता है।
आज का दौर तालीम का दौर है और सभी समुदाय कोशिश करें कि आम मुसलमान तालीमयाफ्ता होकर मुल्क की मुख्यधारा में शरीक हों। करीब-करीब पंद्रह करोड़ की जमात की अनदेखी नहीं कर सकते। उनकी शिरकत जरूरी है। आम मुसलमान बच्चों को ऐसे स्कूलों में भेजें जहां से ये सीखकर आएं कि काफिर खुदा के वजूद को नकारने वाले को कहते हैं, न कि हिंदू को। हिंदू तो पहाड़ों, नदियों, दरख्तों और पत्थरों में भी खुदा खोज लेता है और पूरी कायनात की इबादत करता है। बच्चे यह भी सीखें ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’।
- लेखक मशहूर पटकथाकार व फिल्म निर्माता हैं।