दृष्टिकोण.
राजस्थान सरकार ने गुर्जर आंदोलन समाप्त करने के लिए जो घोषणाएं की हैं उनका कोई भी औचित्य समझ में नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट के अभी तक चले आ रहे प्रावधानों के अनुसार अभी तक राज्य में जो ४९ प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है, उसे एकदम बढ़ाकर ६८ प्रतिशत करने की घोषणा कर देना न केवल राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात है, बल्कि इसमें कई तकनीकी, राजनीतिक व संवैधानिक अड़चनें भी हैं। कानूनी रूप से भी इस घोषणा को चुनौती दिए जाने के कई कारण हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि राज्य सरकार अपनी इस घोषणा को बिना केंद्र सरकार से सामंजस्य के बिना किसी भी रूप में पूरा होते नहीं देख सकती है।
राज्य सरकार ने अपनी घोषणा में सवर्णो को 14 प्रतिशत आरक्षण दने की जो घोषणा की है वह तो सबसे बड़ा छलावा है। जब अशोक गहलोत सरकार ने 21 मई 2003 को सवर्णो को आरक्षण देने की घोषणा की थी और बाकायदा कैबिनेट से प्रस्ताव भी पारित कराया था तो केंद्र में भाजपा की सरकार थी। इस प्रस्ताव को केंद्रीय समाज कल्याण मंत्रालय के सचिव ने मात्र दस दिनों बाद ही इस टिप्पणी के साथ लौटा दिया था कि यह राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार में नहीं आता है।
केंद्र की तत्कालीन भाजपा सरकार का यह नकारात्मक रवैया ही इस बात को स्पष्ट करने के लिए काफी है कि भारतीय जनता पार्टी किस तरह दोहरा चरित्र अपनाती रही है। प्रश्न यह भी उठता है कि जब राज्य सरकार इस तथ्य से भली-भांति परिचित है कि उसी की पार्टी ऐसे ही प्रस्ताव पर केंद्र में रहते हुए संवैधानिक अड़चन लगा चुकी है तो वह किस आधार पर यह आश्वासन दे रही है कि केंद्र से सवर्णो को आरक्षण मिल जाएगा। क्या केंद्र सरकार में बैठी कांग्रेस फिर से वही रवैया नहीं अपनाएगी?
वास्तविकता तो यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इंद्र साहनी बनाम भारत सरकार के मामले में पृष्ठ ३४२ के प्रश्न ४ पर स्पष्ट मत दिया था कि सिर्फ आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। संविधान में आरक्षण सामाजिक आधार पर ही देने की व्यवस्था है। यह ठीक उसी तरह है जिस प्रकार हर राजनीतिक दल महिला आरक्षण की वकालत तो करता है, लेकिन जब भी महिला आरक्षण को कानूनी मान्यता की बात आती है तो सभी पीछे हट जाते हैं। लगभग यही स्थिति सवर्णो के साथ हो रही है। देश के दो बड़े दल कांग्रेस व भाजपा दोनों ने ही इस तरह के प्रस्ताव पास करके वाहवाही तो लूटी, लेकिन आरक्षण दिलाने की दिशा में सार्थक प्रयास एक बार भी नहीं किया। सवर्णो को भी इन राजनीतिक दलों के तौर-तरीके समझ में आने लगे हैं।
तमिलनाडु का उदाहरण देकर जो छल किया जा रहा है उसकी वास्तविकता को समझे बिना वर्तमान स्थिति को नहीं समझा जा सकता है। दरअसल उस समय तमिलनाडु के बल पर ही कांग्रेस सत्ता में आई थी और तमिलनाडु के ६९ प्रतिशत आरक्षण को संसद ने बहुमत से पारित कर संविधान की नवीं अनुसूची में डाला था। उस समय तक स्थिति यह थी कि नवीं अनुसूची को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती थी, लेकिन अब हालात बदल गए हैं और इस अनुसूची को चुनौती दी जा सकती है।
राज्य की भाजपा सरकार ने एक तरफ तो जाटों को खुश करने की कोशिश में गुर्जरों का अहित ही किया, दूसरी ओर सरकार मीणाओं को भी उकसाने का काम कर रही है। इस बात को समझने के लिए कोई तैयार नहीं है कि जब विधानसभा में गुर्जरों को विशेष श्रेणी का आरक्षण देने का प्रस्ताव पास किया जाएगा तो वे ओबीसी से तो बाहर हो ही जाएंगे और विशेष श्रेणी का आरक्षण संभव नहीं होगा, क्योंकि संविधान में संशोधन कौन कराएगा?
जाहिर है कि आरक्षण की यह चिंगारी अपने विकराल रूप में सामने आएगी। १क् अगस्त २क्क्३ में जब अटलबिहारी वाजपेयी ने जयपुर में अमरूदों के बाग में सभा को संबोधित किया था, तब सामाजिक न्याय मंच ने मांग की थी कि आरक्षित को संरक्षण और उपेक्षित को आरक्षण। तब भी केंद्र की भाजपा सरकार ने कोई सुनवाई नहीं की थी।
स्टेच्यू सर्किल पर जब देवीसिंह भाटी ने भूख हड़ताल की थी तो किरोड़ी सिंह बैसला भी हमारे साथ थे। उस समय सभी लोग राजस्थान में भी राजनाथ फामरूला लागू करने के पक्ष में थे, क्योंकि वर्तमान परिस्थितियों में यही फामरूला समस्याओं का सही समाधान बन सकता है। दरअसल राज्य सरकार राजस्थान के लोगों के साथ जो खेल खेल रही है, वह सबको लुभाने वाला तो लग रहा है, लेकिन इस खेल में लगभग वही गलती दोहराई जा रही है, जो चुनाव से पहले गुर्जरों से किए गए वादे के रूप में की गई थी। राजपूतों से लिखित चिट्ठी लेकर वादा किया गया था।
यदि राजस्थान उच्च न्यायालय आरक्षण की घोषित व्यवस्था को खारिज कर देता है तो निश्चित रूप से सरकार दिखावे के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएगी, लेकन संभव है कि सुप्रीम कोर्ट में अंतिम सुनवाई पूरी होने से पहले ही राज्य में विधानसभा चुनाव संपन्न हो जाएं। सीधा मतलब है कि सभी वर्गो के हाथ में चुनाव तक आरक्षण का झुनझुना तो रहेगा, लेकिन किसी को भी कुछ नहीं मिलेगा।