विशेष टिप्पणी.बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती के लिए टाइमिंग का हमेशा महत्व रहा है। शनिवार को केंद्र की यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा के लिए सटीक समय के चयन से उन्होंने एक बार फिर सबको चौंका दिया है। महंगाई की वजह से यूपीए सरकार की बढ़ती अलोकप्रियता और परमाणु करार पर सरकार की असमर्थता को वे देख-समझ रहीं हैं और राजनीति के एक चतुर खिलाड़ी की तरह उन्होंने अपना निर्णय सुनाने का वही समय चुना, जब सरकार अपने कार्यकाल के शायद सबसे कमजोर दौर से गुजर रही है।
समर्थन वापसी को बसपा के हित में बताते हुए मायावती ने इसके कारण के तौर पर बढ़ती महंगाई के अलावा केंद्र द्वारा उत्तर प्रदेश और बसपा की अनदेखी करना बताया। उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि केंद्र सरकार उन्हें ताज कॉरिडोर मामले में तंग कर रही थी। मायावती ने ये जरूर कहा कि केंद्र की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाए जाने की स्थिति में वे एक स्वतंत्र दल के रूप में निर्णय लेंगी। उन्होंने समर्थन वापसी की चिट्ठी राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, लोकसभा और राज्य सभा अध्यक्ष को भेज दी है। तकनीकी तौर पर बसपा के समर्थन वापसी से यूपीए सरकार के अल्पमत में आने का कोई खतरा नहीं दिखता है।
उत्तर प्रदेश में बसपा एक साल से कुछ ज्यादा समय से सत्ता में है। इस दौरान मायावती ने सभी राजनीतिक दलों पर दबाव बनाए रखा है और उनके निशाने पर खास तौर पर मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी है।
जहां एक ओर मुलायम कांग्रेस के साथ नजदीकियां बढ़ा रहे हैं, वहीं आज की तारीख में मायावती को किसी दल के साथ गठबंधन की जरूरत नजर नहीं आती। कुछ राज्यों में हाल में हुए विधानसभा चुनाव में भले ही उनकी पार्टी को ज्यादा सीटें नहीं मिली हों, लेकिन पार्टी का वोट हिस्सा बढ़ा है।
भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के लिए निश्चित तौर पर बसपा ही पहले नंबर की राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी है। जहां सभी कांग्रेस विरोधी पार्टियां आज मनमोहन सरकार की आलोचना कर रहीं हैं, लेकिन सरकार को अस्थिर करने से बच रहीं हैं, वहीं आज के घटनाक्रम के बाद मायावती ने अपनी पार्टी को देश में कांग्रेस की प्रमुख विरोधी पार्टी के तौर पर स्थापित किया है। ये उनकी भविष्य की राजनीति और चुनावी रणनीति का एक संकेत भी है।