लंदन. भारत में संतान के रूप में लड़कियों के मुकाबले लड़कों को दी जाने वाली अहमियत कितना भयावह रूप लेती जा रही है, इस बात का खुलासा यूके स्थित चैरिटी ऑर्गेनाइजेशन ‘एक्शनएड’ की ओर से कराए गए सर्वे के नतीजों में भी किया गया है।
भारत में लिंग अनुपात संबंधी ताजा शोध के नतीजों में सामने आने वाला सबसे सनसनीखेज खुलासा पंजाब से जुड़ा है, जहां के एक खास इलाके का जिक्र करते हुए कहा गया है कि वहां 1,000 लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या सिमटकर सिर्फ 300 रह गई है। पर भारतीय आंकड़े कुछ और ही तस्वीर बयां करते हैं।
दरअसल, एक्शनएड और इंटरनैशनल डिवैलपमैंट रिसर्च सैंटर की ओर से कराई गई शोध में पाया गया है कि भारत में लड़कों के मुकाबले लड़कियों, खासकर उत्तर भारत में जिंदा बच निकलने वाली लड़कियों का आंकड़ा लगातार नीचे आता जा रहा है।
शोध के नतीजों को हाल ही में ‘डिसअपीयरिंग डॉटर्स’ शीर्षक के तहत प्रकाशित किया गया है। रिपोर्ट के तहत अनुमान लगाया गया है कि पिछले दो साल के दौरान ही भारत में करीब एक करोड़ कन्या भ्रूणों को कोख में ही दफन कर दिया गया।
एक्शनएड में कार्यरत महिला अधिकार समिति की अध्यक्ष लॉरा टरक्वेट के मुताबिक, मामले का सबसे दुखद पहलू यह है कि मांओं को न चाहते हुए भी अपनी कोख में पलने वाले कन्या भ्रूणों से छुटकारा पाने को मजबूर किया जाता है और यह चलन सामाजिक विकास के नजरिए से बेहद चिंताजनक है।
सरकारी आंकड़ों में असलीयत कुछ और
भास्कर न्यूज. चंडीगढ़.
इधर, पंजाब में लिंग अनुपात संबंधी सरकारी आंकड़ों पर गौर किया जाए तो तस्वीर कुछ संतोषजनक नजर आती है।
चंडीगढ़ के सैक्टर-32 स्थित गवर्नमैंट मैडिकल कॉलेज में डिपार्टमैंट ऑफ फॉरैंसिक मैडिसन में कार्यरत डी. सिंह, ए. कुमार और के. विज द्वारा तैयार रिसर्च पेपर के मुताबिक, जीरो से छह साल के उम्रवर्ग के तहत लड़के-लड़कियों के बीच फर्क लड़कों के मुकाबले लड़कियों का अनुपात चंडीगढ़ में 773 तक आ गया है, जबकि यहां साक्षरता दर 81.76 फीसदी के साथ बेहतर नजर आती है।
समूचे पंजाब में यह अनुपात 874 है, जबकि राजधानी नई दिल्ली में 821, हरियाणा में 861 और उत्तर प्रदेश में 898 दर्ज किया गया।
इसी रिसर्च पेपर के मुताबिक, सैक्स रेशो के मामले में सबसे बुरा हाल पंजाब के लुधियाना, फतेहगढ़साहिब और पटियाला जिलों का है, जहां लिंगानुपात क्रमश: 824, 851, 864 की चिंताजनक स्थिति तक पहुंच गया है।