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जन्मकालिक ग्रहस्थिति के कारण जातक को शुभाशुभ फल भोगना अनिवार्य है। लेकिन शुभ कार्यो से जन्मांतरीय कर्मजन्य शुभाशुभ फलों को सुधारा जा सकता है तथा नया प्रारब्ध बन जाता है। उसका फल तत्काल प्राप्त होता है। इसलिए शुभ समय में किए गए कार्य जातक को सफलता की ओर ले जाते हैं।
सं तति धर्माचरण एवं पितृों के आशीर्वाद से प्राप्त होती है। अत: सर्वप्रथम कुंडली से किसी अच्छे जानकार पंडित द्वारा यह पता करें कि कहीं आपको पितृदोष तो नहीं है। यह कुंडली पुरुष की होनी चाहिए क्योंकि कई बार महिला की कुंडली में संतान योग होता है किंतु विवाह के बाद महिला का भाग्य पुरुष से जुड़ जाता है और ऐसी अवस्था में पुरुष की कुंडली में पितृदोष के लक्षण हों तो उस दंपत्ति को संतान प्राप्त नहीं होती है।
यदि गर्भ धारण हो भी जाता है, गर्भापात होना या अन्य विकृति आ जाती है, ऐसी अवस्था में संतति के इच्छुक दंपत्ति को रुष्ट पितृों की संतुष्टि हेतु पूर्ण श्रद्धाभाव से शांति-कर्म करवाना चाहिए एवं वर्तमान में जीवित बुजुर्गो की सेवा कर उन्हें संतुष्ट रखना चाहिए।
उक्त कर्म करने के उपरांत संतान प्राप्ति के इच्छुक दंपत्ति को भारतीय प्राचीन ग्रंथों में बताए शुभाशुभ समय का विचार कर शुभ समय में गर्भाधान का प्रयास करना चाहिए। यद्यपि जन्मकालिक ग्रहस्थितिवश जीवमात्र को शुभाशुभ फल भोगना अनिवार्य है। तथापि शुभ कार्यो से जन्मांतरीय कर्मजन्य शुभाशुभ फल का उपशमन होता है तथा नया प्रारब्ध बन जाता है। उसका फल तत्काल प्राप्त होता है।
ग्रंथों में यह उल्लेख मिलता है कि यदि अशुभ समय या अशुभ योग में स्त्री को प्रथम रजोदर्शन होता है तो संतान सुख में बाधा पड़ती है लेकिन प्रथम रजोदर्शन कब होता है, यह याद रखना आसान काम नहीं है। अत: शुभ नक्षत्र, शुभ तिथी व शुभवार चंद्रवार, बुधवार, गुरुवार एवं शुक्रवार में रजस्वला स्त्री को स्नान करना चाहिए। मृगशिरा, रेवती, स्वाति, हस्त, अश्विनी, रोहिणी, इन नक्षत्रों में स्नान करने वाली रजस्वला स्त्री शीघ्र गर्भधारण करती है।
गर्भधारण में त्याज्य बातें
संतानोत्पत्ति की कामना रखने वाले स्त्री-पुरुष को चाहिए कि रजोदर्शन के चार दिन बाद सहवास करने में निम्न बातों को त्याग देवें-
तिथिगंडांत पूर्णिमा या अमावस्या एवं प्रतिपदा, पंचमी एवं षष्टी, दशमीं एवं एकादशी के संधि समय की दो घटी का त्याग कर देना चाहिए।
नक्षत्रगंडांत आश्लेषा-मघा, ज्येष्ठा-मूल, रेवती-अश्विनी, इन नक्षत्रों का संधिसमय त्याग देना चाहिए।
लग्नगंडांत कर्क-सिंह, वृश्चिक-धनु, मीन-मेष, इन राशियों के संधि समय का लग्न त्याग देना चाहिए।
नक्षत्र निधन तारा (वध) एवं जन्म तारा अर्थात नक्षत्र से 7, 10, 16, 19, 25वां नक्षत्र, इनको त्याग देना चाहिए।
मूल, भरणी, अश्विनी, रेवती और मघा, इन नक्षत्रों को त्याग करें।
ग्रहण सूर्य और चंद्र ग्रहण के समय का त्याग करें।
माता-पिता के श्राद्ध के दिन का त्याग करें।
दिन के समय का त्याग करें।
योग व ग्रहयोग परिध योग का पूर्वार्ध उत्पाद से दूषित नक्षत्र, जन्म राशि से आठवीं राशि का लग्न एवं पापग्रह (सूर्य, मंगल, शनि) का लग्न, इन सबको त्याग देना चाहिए। भद्राकरण, षष्ठी, पर्व दिन, रिक्ता तिथि (4, 9, 14), संध्या समय, मंगल, रवि, शनिवार एवं ऋतु दर्शन से चार रात्रि, इन सब बातों को गर्भाधान में त्याग देना चाहिए।
गर्भाधान हेतु शुभ समय का विचार
नक्षत्र उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, मृगशिरा, हस्त, अनुराधा, रोहिणी, स्वाति, श्रवण, घनिष्ठा, शतभिषा, इन 11 नक्षत्रों में गर्भाधान करना उत्तम होता है। चित्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्विनी, इन चार नक्षत्रों में गर्भाधान मध्यम होता है।
ग्रहयोग जन्म राशि से केंद्र 1-4-7-10, त्रिकोण 5-9 में शुभ ग्रह पूर्ण चंद्र, बुध, गुरु या शुक्र हो, 3-6-11 भाव में पाप ग्रह हो, आधानलग्न को पुरुष ग्रह सूर्य, मंगल, या बृहस्पति देखते हों। तिथि द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, एकादशी, द्वादशी एवं त्रयोदशीओज विषम राशि 1-3-5-7-11 के नवांश में चंद्रमा हो और रजोदर्शन से सम रात्रि 6-8-10-12-14-16 रात्रि में गर्भाधान उत्तम पुत्र संतानप्रद होता है।
रजोदर्शन के बाद 5-8-9-10-12-14-15-16 रात्रि उत्तम और 6-7 रात्रि मध्यम, इन 10 रात्रियों में इनमें भी पुत्र की कामना रखनेवाली दंपत्ति 6-8-10-12-14-16 रात्रि में एवं पुत्री की कामना रखने वाले दंपत्ति को 5-9-15-7वीं रात्रि में तथा 1-2-3-5-7-10-11-12-13 तिथियों में सोम, बुध, गुरु एवं शुक्रवार में तथा 4-12-13-15-17-21-22-24-26, इन नक्षत्रों में ही गर्भाधान उत्तम होता है।
इनमें यदि वर्जित समय भी प्राप्त हो तो उसे भी त्याग देना चाहिए। इनमें सहवास करने पर उत्तम प्रकृति वाली विवेकशील, उदार विचार, प्रभावशाली, सत्यप्रिया, परोपकारी तथा बलिष्ठ संतान की उत्पत्ति होती है। अन्य समय में चोर, डाकू, व्याभिचारी, अविवेकी, दुर्बल एवं पाप कर्म करने वाली संतान होती है।