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Astro Speak Astro Speak ज्योतिष चर्चा.
मुहूर्त से जबर्दस्ती पैदा किए हुए बच्चों की जन्मपत्रिका से उस बच्चे का सही-सही फलित बताया जा सके यह असंभव है। क्योंकि यह बच्च तो सहजता से प्रकृति के नियमों के अनुसार इस दुनिया में नहीं आया है। जब उसका जन्म समय ही भगवान की बजाय इंसान ने तय किया है तो देवज्ञ विद्या ज्योतिष द्वारा उस बच्चे के जीवन में होने वाली विभिन्न घटनाओं की सही विवेचना कर पाना मुश्किल हो जाता है।
आजकल हर विषय में ग्लैमर का समावेश हो गया है। ज्योतिष भी इससे अछूता नहीं है। मुहूर्त शास्त्र में व्यक्ति के जन्म से पूर्व उसके गर्भाधान से लेकर मृत्यु के पश्चात श्राद्ध और तर्पण कर्म तक के मुहूर्त की व्यवस्था है।
आजकल कुछ सॉफ्टवेयर में सॉफ्टवेयर निर्माताओं ने एक मुहूर्त का और निर्माण कर दिया है शल्य क्रिया द्वारा शिशु जन्म मुहूर्त। विडंबना यह है कि इस मुहूर्त का प्रसंग ज्योतिष के किसी भी ग्रंथ में नहीं है। सॉफ्टवेयर निर्माताओं को इस प्रकार के मुहूर्त यदि हो तो भी व्यापक जनहित को ध्यान में रखते हुए प्रचारित नहीं करने चाहिए।
ज्योतिष शास्त्र के नियमों के अनुसार जातक की जन्मपत्रिका बनाने के लिए जो समय लिया जाता है उसे तीन श्रेणियों में बांटा जाता है। प्रथम श्रेणी में वो समय होता है जिस समय में मां के गर्भ में बच्चे का बीज पड़ा है अर्थात मां ने गर्भ धारण किया है। यह समय ज्ञात करना अति कठिन है और ज्योतिषी लोग इसके आधार पर जन्मपत्रिका तैयार नहीं करते हैं।
दूसरी श्रेणी में वह समय होता है जिस समय बच्च मां के गर्भ से बाहर आता है। सभी ज्योतिषी जन्मपत्रिका बनाने के लिए यह समय ही काम में लेते हैं। तीसरी श्रेणी वह समय है जब बच्चे के जन्म के बाद बच्चे की नाल काटी जाती है। ज्योतिषी इस समय के अनुसार जन्मपत्रिका नहीं बनाते हैं।
कुछ वर्षो पूर्व तक बच्चों का जन्म सहज प्रक्रिया में ही होता था और उसे नार्मल डिलीवरी कहा जाता था। विशेष परिस्थितियों में ही सीजेरियन या शल्य क्रिया से बच्चे पैदा होते थे। मेडिकल साइंस की तरक्की के कारण आजकल अधिकतर बच्चे विशेषकर शहरी क्षेत्रों में शल्य क्रिया से ही पैदा होते हैं।
आजकल शल्य क्रिया से भी बच्चे दो तरह से पैदा हो रहे है। प्रथम सहज रूप में अर्थात गर्भवती मां की विशुद्ध प्राकृतिक रूप में आवश्यकता के अनुसार और दूसरे सॉफ्टवेयर में बताए मुहूर्त से। प्रथम प्रकार सहज रूप में शल्य क्रिया से बच्चों के जन्म में कोई आपत्ति नहीं है। परंतु दूसरे प्रकार साफ्टवेयर निर्माताओं ने नए आविष्कार शल्य क्रिया द्वारा शिशु जन्म मुहूर्त ने समाज में अनावश्यक भ्रांतियों को जन्म दिया है।
जो माता-पिता अति महत्वाकांक्षी होते हैं और अपने परिवार में जन्म लेने वाली संतान से चमत्कार की अपेक्षा रखते हैं वो कम्प्यूटर की दुकानों से सॉफ्टवेयर द्वारा उक्त मुहूर्त निकलवा लेते हैं और इन मुहूर्तो के अनुसार गर्भवती स्त्री का शल्य क्रिया द्वारा प्रसव करवाने का प्रयास करते हैं। उनकी इस सनक से चाहे परिवार के सदस्य परेशान हो रहे हों, अस्पतालों में डॉक्टरों और दवाओं पर अतिरिक्त व्यय करना पड़ रहा हों, गर्भवती महिला प्रसव पीड़ा से परेशान हो रही हो, जन्म लेने वाले शिशु पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा हो, डाक्टर खुद उनसे ऐसे कृत्य करने को मना कर रहे हो उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता।
उनके सिर पर तो बस एक ही सनक सवार होती है कि शल्य क्रिया द्वारा शिशु जन्म मुहूर्त से उनके घर में पैदा होने वाला शिशु उनके परिवार को सारी परेशानियों से निजात दिला देगा। वह यह भी भूल जाता है कि इस दुनिया में वह स्वयं भी बिना मुहूर्त के ही आया था जबकि उसका यह कृत्य मानवता, समाज, अपने परिवार, गर्भवती महिला और जन्म लेने वाले शिशु सभी के विरुद्ध है।
वो परिवार, गर्भवती महिला और पैदा होने वाले शिशु सभी का उत्पीड़न कर रहा है। यहां पर यह बताना उचित है कि ज्योतिष के सिद्धांत सहज जन्म के आधार पर बनी पत्रिकाओं को ही मान्यता देता है। मुहूर्त से जबर्दस्ती पैदा किए हुए बच्चों की जन्मपत्रिका से उस बच्चे का सही सही फलित बताया जा सके यह असंभव है। क्योंकि यह बच्च तो सहजता से प्रकृति के नियमों के अनुसार इस दुनिया में नहीं आया है और जब उसका जन्म समय ही भगवान के बजाए इंसान ने तय किया है तो देवज्ञ विद्या ज्योतिष उस बच्चे के जीवन में होने वाली घटनाओं की किस आधार पर विवेचना करेगी।
गोस्वामी तुलसीदासजी ने स्पष्ट लिखा है - सुनहु भरत भावी प्रबल बिलख कह्यो मुनिनाथ। हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश विधि हाथ। इंसान अपने धर्म-कर्म से अपने जीवन में हानि, लाभ, यश, अपयश को तो कम ज्यादा करने के प्रयास करे इसमें कोई नुकसान की बात भी नहीं है परंतु जीवन मरण तो सिर्फ और सिर्फ परमपिता परमात्मा के ही अधिकार में है। लोग भूल गए जिस समय उनके घर में बच्चे का जन्म हुआ है उससे बड़ा उनके जीवन में कौन सा शुभ समय होगा। यह समय तो उनके इस जीवन की खुशियों का सबसे बड़ा स्वयंसिद्ध मुहूर्त है।
ज्योतिषं वेदानाम् चक्षु अर्थात ज्योतिष वेदों का नेत्र है। ज्योतिष शब्द का संधि विच्छेद होगा ज्योति + ईश अर्थात ईश्वर की कृपा की वह ज्योति या रोशनी जो हमें भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के बारे में जानकारी देती है। ज्योतिष अध्यात्म और विज्ञान दोनों का मिश्रण है। यह अपने आप में संपन्न विज्ञान है। परमात्मा ने इस विद्या का आविष्कार मानव कल्याण के लिए किया था ना कि विध्वंस और मानसिक प्रदूषण फैलाने के लिए।
ज्योतिषीय सॉफ्टवेयर बनाने वालों ने शल्य क्रिया द्वारा शिशु जन्म मुहूर्त का निर्माण कर ऐसा प्रयास किया है मानो वे डॉक्टरों, चिकित्सालयों और दवा कंपनियों के मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव हों। क्योंकि शल्य क्रिया से प्रसव के मुहूर्त ने सब कुछ असहज कर दिया है। इसके कारण गर्भ का समय पूरा हो जाने या पूरा न हो पाने दोनों ही स्थितियों में गर्भवती मां पर अतिरिक्त पीड़ा तो आएगी ही।
उसे दोनों ही स्थितियों मे अस्पतालों में अतिरिक्त समय गुजारना पड़ेगा, अतिरिक्त दवाओं का सेवन करना पड़ेगा और डॉक्टरों पर भी अतिरिक्त व्यय करना पड़ेगा। इससे मानवता और समाज दोनों पीड़ित होते हैं और साथ ही ऋषि मुनियों द्वारा निर्मित और उनकी अमूल्य धरोहर भारतीय प्राच्य विद्या ज्योतिष भी निश्चित रूप से बदनाम होती है।
शल्य क्रिया द्वारा शिशु जन्म मुहूर्त
गर्भवती महिलाओं को शल्यक्रिया द्वारा प्रसव कराने के लिए निम्नांकित बातों पर विचार करना शुभकारक होगा।
शुभ मास विचार - श्रावण, कार्तिक, चैत्र और पौषमास को छोड़कर अन्य मास में यथा - आषाढ़, भाद्रपद, आश्विन, माघ में मध्यम, जन्मफल और फाल्गुन, अगहन, वैसाख तथा ज्येष्ठ मास में तदनुसार अंग्रेजी मास में फरवरी-मार्च महीना, दिसंबर का महीना, अप्रैल का महीना एवं मई के महीने में प्रसव करना उत्तम फलदायी होता है।
जून-जुलाई का महीना, अगस्त का महीना, सितंबर, नवंबर एवं दिसंबर महीने में प्रसव करना मध्यम फलदायी होता है। शेष अंग्रेजी महीने में प्रसव करना अशुभ फलदायी होता है। अशुभ फल की समाप्ति हेतु यज्ञ, अनुष्ठान अथवा शांतिकर्म से शुभ होता है।
शुभपक्ष शुक्लपक्ष मे प्रसव करना अतिशुभ होता है। वार रविवार, सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार इन दिनों में प्रसव कराना शुभ होता है।
नक्षत्र एवं योग व वज्र्य तिथियां गण्डान्त, ज्येष्ठा नक्षत्र, शूल योग, पात: परिधयोग, व्याघात योग, गंडयोग, क्षयतिथि, संक्रांति, व्यतीपात योग, वैघृति योग, सिनी वाली कुहू (अमावस्या) वज्रयोग, कृष्णपक्ष कीच चतुर्दशी, यमघंटयोग, दग्धयोग, मृत्युयोग, भद्रा सोदर का जन्म नक्षत्र, माता-पिता का जन्म नक्षत्र उपरोक्त नक्षात्रि में शल्य क्रिया प्रसव नहीं करनी चाहिए।
शुभ मुहूर्त मे मुख्य कर्म किसी योग्य पंडित/ज्योतिषी से उपरोक्त प्रकार विचार कराकर शल्य क्रिया द्वारा प्रसव कराना शुभ होता है।