आतंकवाद और इस्लाम का क्या रिश्ता है? क्या ऐसे मुसलमान भी हैं, जो आतंकवादियों से हमदर्दी रखते हैं? अगर हां, तो आखिर क्या वजह है इस हमदर्दी की? क्या ये हमदर्द बाकी मजहब के लोगों से नफरत करते हैं। ये लोग बाकी मुख्यधारा के अमनपसंद मुसलमानों से किस तरह अलग हैं?
दुनियाभर के मुसलमान जेहाद और आत्मघाती हमलों के बारे में क्या सोचते हंै? ऐसे ही कुछ ज्वलंत और मुश्किल सवालों के जवाब मुसलमानों से पूछे गए। गैलप पोल यह दावा करता है कि यह दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा सर्वे है। इस सर्वे की बात अगर मानी जाए तो इसकी सबसे खास बात यह है कि इसके जवाब कई मायनों में हमारी सोच को झकझोरते हैं, कई मुद्दों पर हमारे नजरिये को बदलने पर मजबूर करते हैं।
सबसे पहले वे बातें जो हमारी तयशुदा सोच से अलग हैं। दुनिया के मुसलमानों की ज्यादातर आबादी पश्चिमी देशों को एक तराजू में नहीं तौलती। पश्चिमी देश में रहने वाला हर मुसलमान उसको अपने चश्मे से देखता है और उसकी अच्छाई व बुराई की बुनियाद पर दोस्त और दुश्मन तय करता है, सिर्फ मजहब की बुनियाद पर नहीं। यानी पश्चिम और मुस्लिम दुनिया के बीच जिस सभ्यता के टकराव की बात लगातार कही जा रही है, यह सर्वे उसको बेबुनियाद करार देता है।
‘सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं, लेकिन सारे आतंकवादी मुसलमान क्यों हैं?’ जब यह जानने की कोशिश की गई और पूछा गया कि क्या मुस्लिम समाज में दहशतगर्दी या दहशतगर्दो के लिए थोड़ी भी जगह है? क्या वह पश्चिम की नाइंसाफियों का जवाब देने के लिए, आतंकवाद को हथियार की तरह इस्तेमाल करने के हक में हैं। ९३ फीसदी लोगों ने जवाब नहीं में दिया। कुछ ऐसा ही जवाब जेहाद और आत्मघाती हमलों के बारे में भी मिला।
ज्यादातर मुसलमानों ने इसे गैर—इस्लामिक करार दिया। जम्हूरियत ही एक ऐसी दवा है जो मुस्लिम दुनिया की ज्यादातर बीमारियों का इलाज हो सकती है। एक ऐसा निजाम जिसमें उन्हें खुलकर बोलने का हक हो, औरतों को भी वही हक मिले जिस पर बरसों से मर्दो की हुकूमत रही है। यह दुनिया के ७क् फीसदी मुसलमानों की आवाज है, लेकिन यहां बात उस लोकतंत्र की नहीं हो रही है, जो अमेरिका इस्लामिक दुनिया को सिखाता है बल्कि उस लोकतंत्र की जिसमें इस्लामी मूल्यों की बात हो, मानवधिकारों की बात हो और बाहरी दुनिया से एक बेहतर तालमेल भी। मुसलमान चाहते हैं कि वे अपनी तरह की जम्हूरियत को ईजाद करें। कम से कम ७क् फीसदी मुसलमान ये चाहते हैं कि इस जम्हूरित में बुनियाद शरीयत को ही बनाया जाए। हालांकि यहां वह पाकिस्तान, अफगानिस्तान या ईरान की सरकारों को अपना आदर्श नहीं मानते, न ही धार्मिक नेताओं का सीधे तौर पर सियासत में दखल चाहते हैं।
सर्वे के मुताबिक ऐसा नहीं है कि तमाम मुस्लिम देश अमेरिका या पश्चिमी देशों से एक सिरे से नफरत करते हैं। बड़ी तादाद ऐसे मुसलमानों की भी है जो अरब देशों की बजाय पश्चिमी देशों में रहने को तरजीह देते हैं। पश्चिमी देशों का लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आजादी, औरतों को बराबरी का दर्जा जैसी कुछ ऐसी बातें हैं जो मुसलमानों को प्रभावित करती हैं और वे यह चाहते हैं कि मुस्लिम देश अगर पश्चिमी दुनिया से ये सबक सीखें, तो बेहतर होगा।
यह तो बात हुई कि किस तरह मुस्लिम दुनिया अपने दरीचे से बाहरी दुनिया को देखती है, लेकिन बाहरी दुनिया के लोग, खासकर अमेरिकियों की आधे से ज्यादा आबादी किसी मुसलमान को अपना पड़ोसी नहीं बनाना चाहती, लेकिन साथ ही यह भी कुबूल करते जाते हैं कि उन्हें इस्लाम के बारे में न के बराबर मालूमात है। ४६ फीसदी अमेरिकी ये मानते हैं कि दुनियाभर में बेकसूर नागरिकों पर हो रहे बम धमाकों के लिए किसी भी वजह को जायज नहीं ठहराया जा सकता। फिर भी एक-चौथाई अमेरिकी यह कहते हैं कि इस वक्त जिस तरह के हालात से दुनिया का मुसलमान दो-चार है ऐसे में हथियार उठाना ही आखिरी रास्ता हो सकता है। यहां यह जरूरत महसूस होती है कि अगर गैलप-पोल अमेरिकियों के अलावा दुनिया के दूसरे इलाकों से भी इस्लाम के बारे में राय लेता तो ज्यादा साफ तस्वीर सामने आ पाती।
हालांकि जितनी बड़ी तादाद में लोगों से राय लिए जाने का गैलप-पोल दावा करता है, उस पर तो सवाल उठते हैं लेकिन फिर भी मोटे तौर पर भी देखा जाए तो सर्वे के नतीजों से साफ होता है कि पश्चिमी लेखकों और जानकारों के जरिये जिस मजहबी या सांस्कृतिक टकराव की बात अक्सर कही जाती है, वह बहस इस सर्वे में अपनी जमीन खोती नजर आती है। सर्वे के तमाम आंकड़े और दलीलें ये बताती हैं कि ये टकराव मजहबी उसूलों का नहीं, पश्चिम की मुस्लिम मुखालिफ नीतियों का है। इससे एक उम्मीद भी दिखती है कि वक्त के साथ अगर पश्चिम का रवैया बदलता है और मुस्लिम समाज के दरवाजे बातचीत के लिए खोले जाते हैं तो दोनों समाजों के दरम्यान बमों का नहीं, बातचीत का सिलसिला शुरू हो सकता है।
- लेखिका टीवी पत्रकार हैं।