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सर्वदलीय आम राय बने आरक्षण पर

दृष्टिकोण. gujjar राजस्थान सरकार ने गुर्जरों की ‘विशेष अन्य पिछड़ा वर्ग’ की श्रेणी बनाकर पांच प्रतिशत और राज्य में पहली बार अगड़ों के पिछड़े वर्गो का 14 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया है। आरक्षण के इन प्रावधानों का जहां भारी स्वागत हुआ है वहीं विरोध भी।

संविधान के प्रावधानों के अनुसार जो आरक्षण केंद्र सरकार के दायरे में आता है उसे राज्य सरकार भारत सरकार को संवैधानिक स्वीकृति की प्रक्रियाएं पूरी करने के लिए भेजती है, लेकिन संविधान के निर्देशक तत्वों के अनुसार राज्य सूची में शामिल मसलों पर स्वयं कानून बनाकर उसे लागू कर देती है।

वसुंधरा राजे सरकार के द्वारा गुर्जरों, बंजारों, रैबारी-रायका और गाडिया लुहारों तथा अगड़ों के गरीबों को दिए गए आरक्षण का विरोध इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि यह आरक्षण सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार निर्धारित 50 प्रतिशत के कोटे की सीमा का उल्लंघन करता है।

राजस्थान में की गई आरक्षण की घोषणाओं से आरक्षण का कोटा बढ़कर 68 प्रतिशत हो गया है। इसका विरोध करने वालों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट इसे रद्द कर देगा। हालांकि तमिलनाडु ने 69 प्रतिशत आरक्षण दे रखा है, जो सुप्रीम कोर्ट की हिदायतों से 19 प्रतिशत ज्यादा है। अन्य राज्यों ने कितना आरक्षण दे रखा है यदि इनके आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलेगा कि झारखंड में 73 प्रतिशत, तमिलनाडु में 69 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 52 प्रतिशत, कर्नाटक में 50 प्रतिशत, आंध्र में 49.5 प्रतिशत और उत्तरप्रदेश में 49 प्रतिशत आरक्षण दिया हुआ है। संविधान में आरक्षण के कोटे की कोई सीमा निर्धारित नहीं है। सीमा का निर्धारण तो एक याचिका के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने किया है कि आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तक ही हो।

इस आरक्षण के विरोधी यह भी तर्क देते हैं कि इस आरक्षण की घोषणाओं को कानूनी जामा पहनाने में न्यायपालिका, राजनीतिक, सामाजिक और गुर्जरों की अंदरूनी राजनीति चुनौतियों के रूप में उभर सकती है। सबसे पहले हम गुर्जर, बंजारा, रायका-रैबारी और गाडिया लुहारों को दिए गए ‘स्पेशल केटेगरी’ के 5 प्रतिशत आरक्षण के बारे में देखें। यह बात तो गुर्जर आंदोलनकारी और भाजपा सरकार का नेतृत्व भलीभांति समझ गया था कि वे जिस आरक्षण (एसटी) की मांग कर रहे हैं, वह राज्य सरकार कतई नहीं दे पाएगी और ऐसा आरक्षण उसके हाथ में भी नहीं है। हम इस बारे में की गई चेष्टाओं पर एक नजर डालें।

1995 में वी एम लोकुर की अध्यक्षता में बनी कमेटी के क्या निष्कर्ष थे। इस कमेटी ने जिन जातियों को पिछड़े वर्ग से ज्यादा कमजोर माना, लेकिन अनुसूचित जनजाति के समकक्ष नहीं माना। वे थीं - गुर्जर, गादि, बंजारा, रैबारी आदि। लोकुर समिति की भी सिफारिश यही थी कि इन जातियों को विशेष श्रेणी (स्पेशल केटेगरी) बनाकर ही आरक्षण दिया जा सकता है। यदि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद न्यायपालिका के रवैये को देखें तो हमें ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जब न्यायपालिका ने न्यायिक फैसलों को परिस्थितियों और जनमत का आदर करते हुए समय और काल में बदला है।

कुछ कानूनविदों ने संविधान के अनुच्छेद 16 (4) का हवाला देते हुए कहा है कि पिछड़े वर्ग के लोगों को केवल सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण दिए जाने की व्यवस्था है न कि आर्थिक आधार पर, लेकिन हम इसके साथ संविधान का (प्रियम्बल) उद्देशिका भी पढ़ें। इस उद्देशिका में कहा है - ‘हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुता-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए और सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रदान करते हैं।’

हमारा जनतंत्र जनता के लिए, जनता के द्वारा बनाने का प्रावधान है। इस संदर्भ में यह भी विचार करना होगा कि हमारे संविधान का उद्देश्य देश के सभी नागरिकों को आर्थिक न्याय प्रदान करना भी है। संविधान के अनुच्छेद 38(1) को देखें। इसमें साफ तौर पर कहा गया है कि राज्य में ऐसी सामाजिक व्यवस्था की, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करे, प्रभावी तरीके से उसकी भरसक स्थापना और संरक्षण कर लोक-कल्याण की ओर बढ़ाने का प्रयास करेगा। इसी के साथ संविधान के अनुच्छेद 41 में कहा गया है कि राज्य अपने आर्थिक सामथ्र्य और विकास की सीमाओं के भीतर काम करने, शिक्षा पाने और बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी और नि:शक्तता तथा अन्य किसी प्रकार के अभावों की स्थिति में लोक-सहायता पाने के अधिकार प्राप्त करने का प्रभावशाली उपबंध करेगा।

इस संदर्भ में हम संविधान के अनुच्छेद 46 को भी एक नजर देख लें। इसमें कहा गया है कि राज्य जनता के कमजोर वर्गो, विशेषकर अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा और आर्थिक हितों की विशेष सावधानी से बढ़ोतरी करेगा और सामाजिक अन्याय तथा सब तरह के शोषण से उसकी रक्षा करेगा। संविधान के अनुच्छेद 16 (4) में यह कहा गया है कि राज्य यह भी देखेगा कि लोकसेवा में अगर किसी वर्ग का यथोचित प्रतिनिधित्व नहीं है तो राज्य उसके प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने की व्यवस्था करेगा। इसके लिए राजस्थान ने आर्थिक दृष्टि से पिछड़ों के लिए एक आयोग का गठन किया और उसकी अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था की है। इस व्यवस्था को क्या विधि सम्मत कहा जाएगा? क्या संविधान हमें इस तरह का दिशा निर्देश नहीं देता?

अब एक बार अशोक गहलोत सरकार द्वारा आर्थिक दृष्टि से पिछड़ों को आरक्षण देने के फैसले और उसे भारत सरकार को भेजने की कार्रवाई पर भी गौर करें। अशोक गहलोत सरकार ने 21 मई 2003 में सवर्णो के पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने के बारे में कैबिनेट में प्रस्ताव पारित कर भारत सरकार को भेजा था, लेकिन तत्कालीन भारत सरकार ने इसे लौटा दिया था। वर्तमान सरकार ने भी कैबिनेट में प्रस्ताव पारित किया है। अब वह एक अध्यादेश जारी कर उसे राज्य विधानसभा के विशेष सत्र में पेश कर उसे पारित करने की मंशा जता रही है।

राज्य विधानसभा में पेश किए जाने वाले इस आरक्षण विधेयक पर बहस भी होगी। सुझाव भी आएंगे। संशोधन भी होंगे, लेकिन क्या सदन में आरक्षण के प्रावधानों को और आरक्षण की व्यवस्था को नकारने की स्थिति किसी राजनीतिक दल में होगी? संवैधानिक नियमों, प्रक्रियाओं और पद्धतियों पर अवश्य दो राय हो सकती है, लेकिन आरक्षण की घोषणाओं को कानूनी अमली जामा पहनाने और उसे कानूनी वैधता प्रदान करने के प्रावधानों को पूरा करने की अनिवार्यता सभी को निभानी होगी। विधेयक पारित होने के बाद ही उसे निर्धारित प्रक्रिया के तहत केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। शायद यही प्रक्रियागत अंतर है अशोक गहलोत सरकार और वसुंधरा सरकार का। यही संवैधानिक प्रक्रिया है। संविधान के निर्देशक तत्व का भी प्रावधान है। इसके तहत अनुच्छेद 31 (सी) की व्यवस्था है।

राज्य सरकार राज्य सूची के तहत राज्य स्तर पर शिक्षा और सेवाओं में आरक्षण का प्रावधान कर सकती है। आखिर स्वतंत्रता सेनानियों, विकलांगों, नि:शक्तजनों, विधवाओं, परित्यक्ताओं, बम विस्फोटों के मृतकों, गोली कांडों में मरे लोगों के आश्रितों को जो लोक-सेवाओं में विशेष अवसर देने का प्रावधान किया है, वह कैसे किया? शायद नीति निर्देशक तत्वों के तहत ही किया। आखिर इस पर विरोध का कोई स्वर नहीं उठा? संविधान की राज्य सूची के तहत निर्देशक तत्वों के निर्देशानुसार ऐसे प्रावधान करने का राज्य सरकार को विधि सम्मत अधिकार है।

यह सही है कि आरक्षण के इन प्रावधानों को कोई न्यायपालिका में चुनौती दे सकता है, लेकिन किसी भी दल की सरकार हो, उसे निर्धारित नियमों और संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत ही आरक्षण का प्रावधान करना होगा। सभी राजनीतिक दलों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर आरक्षण के मसले पर आम राय बनानी होगी। दरअसल में इस समय इस मसले को लेकर राजनीति अधिक हो रही है। देखना यह होगा कि शैक्षणिक, राजनीतिक व आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए संविधान के निर्देशानुसार क्या उपाय किए जाएं?

गुर्जर, बंजारा, रायका-रैबारी जातियों को ‘स्पेशल केटेगरी’ में दिए गए आरक्षण का विरोध गुर्जरों में ही उभरा है। जम्मू-कश्मीर के पूर्व एडीजे मसूद चौधरी, राकांपा के विधायक रामवीर सिंह विधूड़ी तो साफ-साफ कह रहे हैं कि समझौते के मसौदे में गुर्जरों को एसटी में शामिल करने की मांग स्वीकार नहीं की है। ऐसे ही स्वर प्रहलादसिंह गुंजल और अतरसिंह भडाना के हैं, लेकिन राज्य सरकार ने 3 दिसंबर 1999 के भारत सरकार के पत्र का जवाब और जस्टिस चोपड़ा कमेटी की रिपोर्ट की इस सिफारिश को कि अनुसूचित जनजाति के वर्तमान मापदंडों में समय की मांग के अनुसार परिवर्तन करने के साथ भेज दिया है।

जहां तक आरक्षण के मसले पर आने वाली कानूनी अड़चनों का प्रश्न है, यदि यह मसला सुप्रीम कोर्ट में भी जाएगा तो एक बार फिर आरक्षण, उसे प्रदान करने की संवैधानिक प्रक्रियाओं और प्रावधानों पर गंभीर बहस होगी। इस बहस के बाद कोई फैसला भी होगा तो इसमें बुरा क्या है? आखिर यह फैसला भी तो सभी राजनीतिक दलों की सरकारों को एक नसीहत तो होगी, भले ही वह सरकार कांग्रेस की हो या भाजपा की।
- लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।





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