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न्यायिक सुधार के प्रति उदासीनता

न्याय का राज स्थापित करने की दुहाई देने वाली सरकारें न्याय व्यवस्था को जनोन्मुखी और अविलंब न्याय देने वाली बनाने के प्रति हमेशा ही उदासीन रही हैं। इसी का परिणाम है कि एक तरफ जहां विधि आयोगों की सिफारिशें धूल खाती पड़ी हैं, वहीं देश के लगभग दस करोड़ लोग न्याय पाने की प्रतीक्षा में खड़े हैं।

न्याय प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाने तथा आजाद भारत के कानूनों को लोक हितैषी स्वरूप देने की कई सिफारिशें विधि आयोग समय-समय पर करता रहा है, जिससे आम आदमी को सस्ता व सुलभ न्याय मिल सके। इन सिफारिशों को इस तर्क के आधार पर सरकारों ने मानने की जरूरत नहीं समझी कि सरकार इसके लिए बाध्य नहीं है। देश में कानून अपना काम तो कर रहा है, लेकिन उसके प्रति लोगों में विश्वास तब बढ़ेगा जब न्याय का ऐसा राज कायम हो जिसमें आम आदमी को त्वरित व औचित्यपूर्ण न्याय मिल सके। दुर्भाग्य से न्याय प्रशासन इस अपेक्षा को पूरा करने में पूरी तरह सक्षम नहीं हो पाया है।

समय-समय पर न्याय व्यवस्था की खामियों और विसंगतियों को दूर करने पर विमर्श होता रहा, लेकिन सरकार की इस दिशा में उदासीनता के चलते न्यायिक सुधार की दिशा में कुछ बेहतर नहीं हो सका। सुप्रीम कोर्ट की ताजा रिपोर्ट में दी गई यह जानकारी कम चिंताजनक नहीं है कि विभिन्न अदालतों में लंबित प्रकरणों की संख्या लगभग तीन करोड़ है। लंबित प्रकरणों को शीघ्र निबटाने की जो भी कोशिशें अब तक हुईं वे नाकाफी साबित हुई हैं। यह कहा जाता है कि देर से मिलने वाला न्याय न्याय नहीं रह जाता और कई देशवासी न्याय पाने के लिए कभी-कभी अगली पीढ़ी तक इंतजार करने के लिए बाध्य हैं।

देश के कई कानून या तो जनविरोधी हैं या बदलती परिस्थितियों में प्रासंगिक नहीं रह गए हैं। इन कानूनों को समाप्त करने की विधि आयोगों की सिफारिशें जहां नजरअंदाज होती रही हैं, वहीं न्याय व्यवस्था को कारगर बनाने के लिए आवश्यक संसाधनों के अभाव को दूर करने को प्राथमिकता नहीं दी जा सकी। यदि न्याय मांगने का अर्थ करोड़ों की भीड़ का हिस्सा बनना या उस कतार को लंबा करना है, तो कानून हाथ में लेने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन ही मिलेगा। किसी भी समाज या देश का विकास तभी सार्थक होता है जब न्याय की गारंटी सुलभ हो। दुनिया में महाशक्ति बनने के सपने को साकार करने में न्याय व्यवस्था को सक्षम व जनोन्मुखी बनाना एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।





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