दृष्टिकोण.
राजस्थान में दो बार गुर्जरों द्वारा आंदोलन किया गया है। दोनों आंदोलन में करीब 65 लोगों ने अपने प्राण गंवाए हैं। सार्वजनिक संपत्ति को हानि हुई है और लाखों निर्दोष लोगों को अपने कार्य और धन की क्षति पहुंची है। हजारों लोगों को समय पर उपचार नहीं मिल सका। सरकार ने इन नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन कैसे होने दिया? क्या ये नागरिक क्षतिपूर्ति के अधिकारी नहीं हैं? इनकी क्षतिपूर्ति कौन करेगा?
करोड़ों रुपए के व्यवसाय की हानि की पूर्ति कैसे होगी? क्या इन सबको भी न्यायालय के द्वार खटखटाने होंगे? राज्य सरकार ने समझौता कर लिया और आंदोलनकारी गुर्जरों ने आंदोलन समाप्त भी कर लिया। सरकार ने विशेष श्रेणी बनाकर पांच प्रतिशत आरक्षण में गुर्जर, बंजारा, गाडियालुहार तथा रैबारी तबकों को शामिल कर लिया तथा 14 प्रतिशत आरक्षण अगड़ी जातियों (सवर्णो) को देने की घोषणा भी कर दी। इस प्रकार राज्य में आरक्षण 68 प्रतिशत हो गया है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने यह सीमा 50 प्रतिशत ही तय कर रखी है।
राजस्थान में दुखद स्थिति यह है कि यहां पर ४९ प्रतिशत आरक्षण तो जातियों के आधार पर है। भाजपा सरकार संभवतया यह सोच रही है कि तमिलनाडु की तरह संसद में कानून लाकर इसे नवीं अनुसूची में डाला जा सकेगा। राज्य सरकार संभवतया स्थिति में गुम्फित जटिलताओं की अनदेखी कर रही है। ज्यादा समय नहीं हुआ। राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार ने भी 21 मई 2003 को सवर्णो को 14 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की थी और मंत्रिमंडल में पारित इस आशय के प्रस्ताव को केंद्र की भाजपा सरकार को भिजवाया था, जिसे मात्र दस दिनों में लौटा दिया गया था और कहा गया था कि यह राज्य के क्षेत्राधिकार में नहीं आता। राज्य की वर्तमान भाजपा सरकार को केंद्र की संप्रग सरकार से क्या अपेक्षा है?
गुर्जरों को विशेष श्रेणी देने में भी इन्हें ओबीसी से निकालना होगा। राज्य सरकार द्वारा नियुक्त जस्टिस चोपड़ा कमेटी ने भी गुर्जरों को एसटी में शामिल करने की सिफारिश नहीं की है। इसके विपरीत एसटी में शामिल मीणाओं ने बार-बार चेतावनी दी है कि आरक्षण की विद्यमान व्यवस्था से छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस प्रकार से जातीय संघर्ष की पूर्व स्थितियां बन रही हैं।
यह चिंगारी भाजपा शासन के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने संभवतया तात्कालिक राजनीतिक लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से जाटों को ओबीसी में शामिल कर उन्हें खुश करने का प्रयास करके सुलगाई थी। गुर्जरों का सबसे बड़ा अहित तो उसी समय शुरू हो गया था जब वसुंधरा राजे ने आम चुनावों से पूर्व गुर्जरों को आरक्षण देने का वादा कर यही खेल खेला था। इसने मीणाओं को उकसाने का काम किया था। दोनों तरफ बंदूकें तन गई थीं। ये आज भी तनी हुई हैं।
शासक दल को राजनीतिक स्वार्थ साधन से ऊपर उठकर यह सोचने का समय आ गया है कि जातिवाद की भावना राष्ट्र विरोधी है अत: राजनीतिक दलों को अपनी जातियों को समाज पर नहीं थोपना चाहिए। स्वयं प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने इस खतरे को भांप लिया था और जातिवाद के आधार पर समाज को बांटने के प्रति देशवासियों को सावधान किया था। यहां तक कि संविधान निर्माताओं के अग्रदूत डॉ. अंबेडकर ने समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित लोकतंत्र की वकालत की थी।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आरक्षण की निर्धारित अधिकतम सीमा का उल्लंघन कुछ राज्यों ने किया है, जिनमें तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, झारखंड, उत्तरप्रदेश शामिल हैं। यह सही है कि आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा का निर्धारण सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला है। संवधिान में तो इसकी समय सीमा दस वर्ष निर्धारित है, प्रतिशत नहीं। परंतु आज आवश्यकता आरक्षण की संपूर्ण स्थिति के पुनरावलोकन की है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है यदि जाति आधारित आरक्षण पढ़ाई में और नौकरियों में जारी रहता है तो मेरिट लाने वाले विद्यार्थियों का भविष्य अंधकारमय होता चला जाएगा। सरकारी सेवाओं में आरक्षण पर आधारित नुकसान से कहीं ज्यादा बड़ा नुकसान उन विद्यार्थियों को होगा जो कठोर परिश्रम करके परीक्षा में अपना प्रतिशत ऊंचा उठाते हैं। जातिगत आरक्षण की आड़ में मेरिट दफन होता जा रहा है। यह यक्ष प्रश्न है जिसका उत्तर आरक्षण की व्यवस्था को सदा के लिए समाप्त करने में ही निहित है।
आरक्षण पर कई बार सामान्यजन, प्रबुद्धवर्ग, बुद्धिजीवी चिंतक तथा मध्यम वर्गीय मानसिकता वाले नागरिकों का चिंतन सामने आया है। मीडिया ने भी इस प्रश्न को विभिन्न तरीकों से उठाया है, लेकिन वह समय कब आएगा जब इन कथित पिछड़े तबकों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जाएगा? सच्चाई यह है कि वह समय आ गया है।
हमारा लोकतंत्र ६क् वर्ष की प्रौढ़ोत्तर स्थिति से गुजर रहा है। उसके हर वर्ग, जाति और श्रेणी के नागरिक जागरूक हो गए हैं-होते जा रहे हैं। वे अब आरक्षण की इस लड़ाई से तंग आ गए हैं। वे एक स्वर से चाहते हैं कि आरक्षण बंद कर दिया जाए। जिन पिछड़े वर्गो को संविधान (अनुच्छेद १६ (४)) में केवल सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण मिला हुआ था, उनकी स्थिति में भी अब बहुत बदलाव आया है और यह क्रम जारी है। हमारे संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की कोई व्यवस्था नहीं है। अतएव फिलहाल आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात भी एक प्रकार से बेमानी हो जाती है। अब आरक्षण को सदा के लिए अलविदा करने का समय शेष रहता है।
इस मुद्दे पर राज्यों में नहीं, बल्कि पूरे देश में एक जनमत संग्रह कराया जाए कि क्या अब जातिगत आधार पर आरक्षण की आवश्यकता है? क्या अब आरक्षण अप्रासंगिक नहीं होता जा रहा है? क्या इसे 25 जनवरी 2010 के बाद भी जारी रखा जाना चाहिए? अथवा इसके पूर्व ही समाप्त कर दिया जाना चाहिए? मेरिट को अथवा योग्यता को आगे आने का अवसर कब मिलेगा? ऐसा एक राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह होना चाहिए। इस लोकतांत्रिक यज्ञ का प्रारंभ शासन को ही करना चाहिए। इस जनमत संग्रह के आधार पर लिया गया निर्णय सर्वमान्य होगा। यह आमजन का फैसला होगा। यह संविधान जितनी ही पवित्रता रखेगा और देश का अब तक का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक निर्णय होगा।
- लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।