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इंदौर. 1971 बांग्लादेश युद्ध के हीरो देश के पहले फील्ड मार्शल सैम मानेक शॉ अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति थे। मालवा को भी उनके जोश को महसूस करने का मौका मिला था। 80 के दशक में महू के दौरे पर जब वे आए थे तो उन्होंने कहा था-फील्ड मार्शल कभी रिटायर नहीं होता। वे सच कहते हैं दुश्मनों के दांत खट्टे करने की उनकी रणनीति हमें हमेशा प्रेरणा देती रहेगी और यह फील्ड मार्शल कभी रिटायर नहीं होगा।
आखिरी दम तक लड़ते रहे..
25 जून को कोमा में जाने से पहले सैम मानेकशॉ के अंतिम शब्द थे, ‘मैं ठीक हूं’। उनका इलाज करने वाले वेलिंगटन मिल्रिटी अस्पताल के डॉ. एम प्रसाद ने बताया कि अपने अंतिम समय में भी फील्ड मार्शल ने आत्मविश्वास नहीं खोया था।
वह एक योद्धा की तरह ही रहे और चेहरे पर मुस्कान बिखेरते हुए कहा कि ‘मैं ठीक हूं।’ डॉ. प्रसाद ने कहा कि मानेकशॉ हंसमुख, विनोदी और हाजिरजवाब व्यक्ति थे। मानेक शॉ के परिवारिक मित्र छिल्लू मेहता ने बताया कि पिछले चार साल में उन्होंने उन्हें कभी गुस्सा होते नहीं देखा।
प्यार में हुए थे कैद
सेना में मानेक शॉ ने कई जीत दर्ज कीं, लेकिन लाहौर में हुई एक मुलाकात के दौरान वे मोहब्बत में गिरफ्तार हो गए। 1937 में एक सार्वजनिक समारोह के लिए लाहौर गए सैम की मुलाकात सिल्लो बोडे से हुई। इस छोटी मुलाकात में दोनों काफी निकट आ गए। दो साल की यह दोस्ती 22 अप्रैल 1939 को विवाह में बदल गई।
पद्म विभूषण, पद्म भूषण
युद्ध की उपलब्धियों के फलस्वरूप 1972 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इससे पहले 1968 में उन्हें पद्म भूषण से अलंकृत किया जा चुका था। सर्वोच्च सैन्य सम्मान का मौका तब आया जब 1 जनवरी, 1973 को उन्हें फील्ड मार्शल की रैंक दी गई। इसके 15 दिन बाद वे सेना से सेवानिवृत हो गए।