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अकूत दौलत के शिखर पर बैठकर आदमी क्या सोचता है? लाखों लोगों की तरह रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने का संघर्ष तो वह जमाने पहले पीछे छोड़ चुका है। बेशकीमती चीजों को पाने की हसरतें भी व्यतीत हो चुकी हैं। तो भी दौलत की लालसा कभी खत्म नहीं होती। इतिहास गवाह है, बेशुमार दौलत के पर्वत पर आसीन शख्स के दिमाग में वीतराग या मायामोह से मुक्ति अक्सर सबसे आखिरी विचार होता है। इसीलिए विलियम्स बिल गेट्स की कार जब 27 जून को माइक्रोसॉफ्ट के दफ्तर से आखिरी बार बाहर निकली, तब यह दुर्लभ यात्रा की शुरुआत थी।
उद्यम और पूंजी की दुनिया में आज दौलतमंद कम नहीं, लेकिन 53 की उम्र में भरा-पूरा औद्योगिक साम्राज्य दूसरों के हाथों में छोड़कर नई यात्रा शुरू करने का साहस कम ही कर पाते हैं। नई यात्रा भी अपनी निजी बेहतरी की नहीं, बल्कि सर्वजन की बेहतरी की। अब वह दुनिया को बेहतर बनाने के कामों में अपने को लगाएंगे। एड्स के विरुद्ध उनका अभियान तो नया नहीं रहा, अब वह मलेरिया जैसी बीमारियों से मुक्ति के लिए काम करेंगे। रिन्यूएबल कृषि उनका नया सपना और विचार है।
भारतीय संस्कृति में दौलत के शिखर पर संन्यास का विचार नया नहीं है, आखिर इनफोसिस के नारायण मूर्ति हाल ही में यह उदाहरण पेश कर ही चुके हैं। लेकिन अमेरिका की भोगवादी संस्कृति में बिल गेट्स का होना ज्यादा दुर्लभ और चमत्कारी है। प्रस्तुत है दुनिया का सबसे दौलतमंद संन्यासी बनने की घटना के विभिन्न पहलुओं पर एक नजर।
कंप्यूटर का नन्हा दीवाना
सन् 1955 के जाड़ों में 28 अक्तूबर को अमरीका में बिल गेट्स का जन्म हुआ। घर में दो बहनें भी थीं। तब कोई नहीं जानता था कि सिएटल में बड़ा हुआ यह बच्च एक दिन दुनिया की सबसे बड़ी सॉफ्टवेअर कंपनी का मालिक बनेगा। स्वप्नदर्शी तो वह तब भी था, जब छोटा बच्च था। 1968 में सिएटल के लेकसाइड प्रेप स्कूल में बिल ने पहली बार कम्प्यूटर देखा और उसकी नन्ही उंगलियों ने कम्प्यूटर को हल्के से छुआ। बिल के लिए यह नई और अनोखी चीज असीम जिज्ञासा और सवालों की खान थी।
बिल, पॉल और एलन कम्प्यूटर के दीवाने थे। दिन-रात सिर्फ प्रोग्रामिंग के बारे में पढ़ते और खुद बनाने की कसरत में लगे रहते। पढ़ाई कहीं पीछे छूट गई थी। स्कूल में, घर में सिर्फ कम्प्यूटर ही कम्प्यूटर था। अब होमवर्क भी पूरा नहीं होता और स्कूल से भागकर कम्प्यूटर की प्रोग्रामिंग की जाती।
1968 के वसंत में सिएटल में कम्प्यूटर सेंटर को-ऑपरेशन खुला। जिसके तहत स्कूल के बच्चों को कम्प्यूटर सिखाया जाता। बिल और उसकी टोली बड़ी प्रसन्न थी। अब इधर-उधर मशीनों की तलाश में भटकने की जरूरत नहीं थी। बाकी बच्चे तो शांति से जितना बताया जाता, सीखकर संतुष्ट हो लेते, लेकिन बिल और उसकी मंडली को यह संतोष नहीं था।
जाने कितनी मशीनें खराब हुईं, कम्प्यूटर का सिक्योरिटी कोड टूटा, सिस्टम उलट-पुलट गए। यहां तक कि स्कूल में उनके कम्प्यूटर इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध भी लगा दिया गया। लेकिन बिल की जिज्ञासा तब भी खत्म होने को नहीं आई। 1968 के ही आखिरी दौर में झील के किनारे के उन युवा वैज्ञानिकों ने एक प्रोग्रामिंग ग्रुप बनाया, जिसमें बिल गेट्स, पॉल और लेकसाइड प्रेप स्कूल के दो और विद्यार्थी शामिल थे। वे अपनी प्रतिभा को दुनिया पर आजमाना चाहते थे। सौभाग्य से उन्हें इसका मौका भी मिल गया, जब कम्प्यूटर सेंटर को-ऑपरेशन ने उनके साथ एक डील की। बिल और उसके साथी कम्प्यूटर के बग्स और सिस्टम की कमियां पता लगाने का काम करते थे और इसके बदले में वे जितनी देर चाहते, कम्प्यूटर पर काम कर सकते थे। एक अजीब-सा नशा था। दिन-रात सिर्फ कम्प्यूटर ही उनकी जिंदगी हो गया था।
अपना कौशल दिखाने का उन्हें दूसरा मौका मिला। इन्फॉर्मेशन सांइस इंस्टीट्यूट ने उन्हें एक पे-रोल प्रोग्राम बनाने के लिए बुलाया। पहली बार इस काम में उन्हें कुछ पैसे भी मिले। इसके बाद उन्होंने ट्रैफिक की गणना करने वाला एक सॉफ्टवेअर बनाया, जिससे लगभग 20,000 डॉलर कमाए। 1973 के वसंत में बिल हार्वर्ड विश्वविद्यालय का विद्यार्थी था। जैसे लेकसाइड प्रेप स्कूल में बिल का मन पढ़ाई का बिल्कुल नहीं रमता था, वही हाल यहां हार्वर्ड में भी था।
कॉलेज में जो पढ़ाया जाता, उसमें बिल की कतई रुचि नहीं थी। 197५ में बिल ने कॉलेज छोड़ दिया और एक कंपनी की स्थापना की। यह कंपनी कम्प्यूटर की दुनिया के अनुसंधान पर निकली थी। हर दिन ढेरों नए प्रयोगों और अथक परिश्रम से बिल के सामने एक नई दुनिया का रास्ता खुल रहा था। यह कंपनी, जिसे अपनी तरह की दुनिया की पहली कंपनी होना था, जिसे पूरी दुनिया के उद्योगों और संचार के इतिहास को पलटकर रख देना था।
यह कंपनी थी - माइक्रोसॉफ्ट।
बिल की ५ हिदायतें
अगर आप गड़बड़ियां करते हों तो उसके लिए अपने माता-पिता को दोष न दें। अपनी गलतियों का रोना रोने के बजाय उनसे सीखने का प्रयास करंे।
>>आपके पैदा होने से पहले आपके माता-पिता इतने नीरस नहीं थे, जितने अब हैं। वे आपके जरूरी-गैर जरूरी खर्च उठाने, आपके कपड़े साफ करने और आपकी हर बात सुनने की वजह से ऐसे हो गए हैं।
>>आपकी स्कूल में हर चीज का निर्धारण भले ही पास-फेल से होता हो, लेकिन जिंदगी में हर बार ऐसा नहीं होना जरूरी नहीं है।
>> जिंदगी की स्कूल में सेमेस्टर्स नहीं होते। इसमें आपको गर्मियों की छुट्टियां नहीं मिलेंगी।
>>अनाकर्षक व्यक्तियों के प्रति भी अच्छी राय रखें। हो सकता है आपको ऐसे ही किसी व्यक्ति के लिए काम करना पड़े।
यह भी खूब !
>> बिल गेट्स 250 डॉलर प्रति सेकेंड कमाते हैं यानी रोजाना दो करोड़ डॉलर।
>> अगर उनके हाथ से एक हजार डालर का नोट गिर जाए तो उन्हें उसे उठाने की जरूरत नहीं रहेगी। उसे उठाने में उन्हें चार सेकेंड का समय लगेगा और इतने समय में वे हजार डॉलर कमा लेंगे।
>> अमेरिका पर कुल कर्ज 5.62 ट्रिलियन डॉलर है। अगर बिल गेट्स को इस कर्ज का भुगतान करने को कहा जाए तो वे 10 साल से भी कम समय में उसे चुकता कर देंगे।
>> वे संसार के प्रत्येक व्यक्ति को 15 डॉलर दान दे सकते हैं और उसके बाद भी उनके पास 50 लाख डालर बच जाएंगे।
>> अगर गेट्स के पास कुल राशि को एक डालर के नोटों में तब्दील कर दिया जाए तो उन्हें जोड़कर धरती से चंद्रमा तक 14 बार सड़क बनाई जा सकती है। लेकिन एक व्यक्ति को यह सड़क बनाने में 1400 साल लगेंगे, वह भी लगातार 24 घंटे काम करने पर।
>> अगर माइक्रोसाफ्ट विंडो के यूजर्स हर बार कम्प्यूटर हेंग होने पर हर्जाने के तौर पर एक-एक डॉलर की मांग करने लगें तो गेट्स तीन साल में दिवालिया हो जाएंगे।