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‘ज्ञान’ शब्द कब अपने आप विशेषण में बदल गया होगा, इस बारे में ठीक-ठीक समय बताना बड़ा मुश्किल है, लेकिन मेरा मानना है कि पिछले 20 सालों में किसी क्षण ऐसा हुआ होगा। व्यापार के लिए आज बौद्धिक सम्पदा अहम बनती जा रही है। हर डेस्कटाप पर कम्प्यूटर दिखने लगे हैं, कंपनियां ज्ञान प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। इसी का नतीजा है नॉलेज इकोनामी (ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था) का विकास। इससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अन्य देशों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिली है।
इससे दुनिया बदलने की शुरुआत भी हुई है, लेकिन यह भी जान लंे कि यह केवल एक आगाज भर है। आज जिस ‘ज्ञान’ पर नॉलेज इकोनामी टिकी हुई है, दरअसल वह ज्ञान के नाम पर केवल आंकड़ों और तथ्यों का पिटारा भर है। ज्ञान शब्द तो अपने आप में बहुत गहराई लिए हुए है। बकौल मैनेजमेंट गुरु टाम डेवेनपोर्ट, ‘‘अनुभवों, संदर्भो, व्याख्याओं और प्रतिक्रियाओं का मिला-जुला रूप है ज्ञान।’’ संक्षेप में कहें तो ज्ञान वे सूचनाएं हैं, जो अपने प्रतिस्पर्धी की तुलना में आपको सवा सेर बनाती है।
हममें से अधिकांश अब ऐसी दुनिया में रह रहे हैं, जिसे सूचनाओं का लोकतंत्र कहा जा सकता है। अगर आपके पास पीसी है तो उन सभी सूचनाओं तक आपकी सहज पहुंच हो सकती हैं जो इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। उन्नत किस्म के सॉफ्टवेयर्स की मदद से अब सूचनाओं को उस ढंग से आसानी से हासिल किया जा सकता है, जिस बारे में कुछ साल पहले तक कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
सूचनाएं जहां आसानी से इधर से उधर बहना चाहती हैं, वहीं ज्ञान इस मामले में थोड़ा संकोची होता है। ज्ञान को समझना और दूसरों को समझाना इतना आसान नहीं है। अपने साथियों, कार्य करने वाले सहयोगियों और ग्राहकों के ज्ञान को संयोजित करने की आपकी क्षमता से ही सफलता और विफलता तय होगी।
(बिल गेट्स द्वारा न्यूजवीक में लिखे गए विशेष आलेख का सार)