Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे.
आज नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे जाकर रामगोपाल वर्मा और उनके कलाकार ‘सरकार राज’ के लिए दर्शक जुटाने की कोशिश कर रहे हैं और इससे कम मेहनत में बेहतर फिल्म बन जाती और इस प्रचार यात्रा के कष्ट से वे बच जाते।
इतना ही नहीं, उद्योग की पत्रिकाओं में आंकड़ों के आईने में फिल्म की सफलता सिद्ध करना चाहते हैं। दोनों ही पक्षों के लिए यह आवश्यक कसरत है क्योंकि वर्मा को और नहीं तथा बच्चन को दूसरा ठौर नहीं है।
कुछ भीतरी जानकारों से खबर मिली है कि फिल्म के लिए बच्चन परिवार के तीनों सदस्यों का मेहनताना पांच करोड़ रुपए तय पाया गया था, परंतु निर्माण के मध्य चरण तक फिल्म बहुत ऊंची कीमत देकर एकता कपूर की बालाजी कंपनी ने खरीद ली। सुनते हैं कि अमिताभ ने पारिश्रमिक दस करोड़ रुपए कर दिया और वर्मा ने स्वीकार कर लिया।
दोनों ही पक्षों के लिए सफलता का भ्रम बनाना जरूरी है ताकि तीसरा खंड आर्थिक आधार पा सके। वर्मा ने गैर-सितारा फिल्मों का हश्र देखा है और हर बच्चनीय प्रयास में उन्हें लाभ मिल ही जाता है। उनके प्रयासों की आग में कुछ दूसरे लोग झुलसते हैं।
यह अजीब सी बात सामने आई है कि जो भीड़ सितारों को देखने के लिए इस तरह की प्रचार यात्राओं में इकट्ठी होती है, वह अगले दिन फिल्म देखने नहीं आती और सिनेमाघर की आय में वृद्धि नहीं होती। ठीक इसी तरह चुनावी सभाओं में कुछ नेता-अभिनेता भारी भीड़ जुटा लेते हैं जो वोटों में नहीं बदलती। हिंदुस्तानी अवाम मंझा हुआ तमाशबीन है और वह तालियां कहीं बजाता है और वोट कहीं और दे आता है। उसे मजमे देखने का गहरा और पुराना अनुभव है।
वह सदियों से आदर्शवादी ग्रंथ पढ़ता और सुनता आया है परंतु अपनी मोटी चमड़ी के भीतर उच्च नैतिकता को प्रवेश करने ही नहीं देता। उसके आचार-व्यवहार में दोहरे मानदंड हैं। वह चतुर है और अपनी सुविधानुसार चयन करता है। वह मंदिर में शीश झुकाकर बाहर निकलता है और भिखारी के हाथ खोटी चवन्नी टिका देता है।
उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती। चौपाल से लेकर मल्टीप्लैक्स तक की यात्रा में उसने अनुभव प्राप्त किया है और अपने मनोरंजन चयन में हुकूमत के चयन से कम ही गलती करता है। उसकी आंखों ने अनेक शोभायात्राएं और शवयात्राएं देखी हैं और वह तमाशे के पार देखना सीख चुका है। हमारे नेता, संपादक और फिल्मकार ही उसे सचमुच आंक नहीं पाते। उसने रामराज्य भी देखा है, मुगल राज भी देखा है और अंग्रेज राज भी भुगता है। उसे सरकार राज कैसे ठग सकता है।