News
Chhattisgarh
Bilaspur Bilaspur बिलासपुर.
पिछले तीन-चार दिनों से पेंड्रा क्षेत्र में हो रही बारिश से अरपा नदी का जलस्तर बढ़ने लगा है। इस वर्ष 28 जून को ही अरपा के रूप को देखकर अरपा किनारे बसे लोग बाढ़ की आशंका पर जोर देने लगे हैं। खासकर तब, जब मौसम विशेषज्ञ भारी बारिश की चेतावनी दे रहे हैं।
15 साल पहले सन् 1993 में अरपा नदी बौराई थी। जब तटवर्ती क्षेत्रों चांटापारा, जबड़ापारा, पचरीघाट, मधुबन, नारियल कोठी, चांटीडीह, लिंगियाडीह आदि क्षेत्रों में काफी नुकसान हुआ था। शनिचरी की कई दुकानों समेत नदी किनारे की झोपड़ियां बह गई थीं। वह मंजर आज भी बुजुर्गो को याद है, जब घर के बड़े-बुजुर्ग रतजगा करते थे। बीते 6-7 वर्षो में अरपा में बाढ़ की बात तो दूर पाटोपाट चलने की बात को भी लोग माथे पर बल देकर याद करते हैं।
अब न तो लोगों को अरपा का जलस्तर बढ़ने से खतरा नजर आता है, न ही वे पुरानी बात को याद करना चाहते हैं। कतियापारा निवासी रामजी केंवट बताते हैं कि जब अरपा का पुराना पुल ही बना था, तब बहतराई, खमतराई, लिंगियाडीह, चांटीडीह के लोग पानी बढ़ने पर नाव (डोंगा) से नदी पार करते थे। उस समय कतियापारा के पास के क्षेत्र को डोंगाघाट के नाम से जाना जाता था। दोनों तरफ गाड़ियां खड़ी होती थीं। उस समय रपटा पुल नहीं बना था।
पांच-छह साल पहले भी बाढ़ आई थी, जिसमें पचरीघाट और जबड़ापारा के कुछ क्षेत्र डूब गए थे। करीब 60 साल पहले आई बाढ़ की याद करते हुए वे बताते हैं कि उदई चौक स्थित खाखी बाबा मंदिर के आधा हिस्सा डूब गया था। उस समय की बाढ़ की उनकी याद में सबसे भयावह बाढ़ थी। अरपा नदी बौरा गई थी और नदी का पानी हिलोरें मार रही थीं, जैसे सबकुछ बहा ले जाना चाहती हो।
जूना बिलासपुर पचरीघाट के संतोष कैवर्त उर्फ डालू काफी याद करने के बाद बताते हैं कि जिस वर्ष इंदिरा गांधी की मौत हुई थी (सन् 1984), उस वर्ष अरपा में बाढ़ आई थी, तब उनकी उम्र 20-22 वर्ष थी। पचरीघाट के घरों में पानी भर गया था। लोग छत पर चले गए थे, तब उन्होंने अन्य मित्रों के साथ फंसे हुए लोगों व सामान को बाहर निकालने में मदद की थी। उसके बाद अब तक उन्होंने अरपा में उफान नहीं देखा है। उस बाढ़ में शनिचरी की एक बर्तन दुकान की गुमटी बह गई थी, जो पचरीघाट के किनारे फंसकर रुकी थी। आसपास के काफी लोगों को बर्तन भी मिले थे।
एक रुपए में उस किनारे
कतियापारा डोंगाघाट में रहने वाले केंवट करीब 20 साल पहले बरसात के दिनों में नाव चलाते थे। उस समय जब अरपा का पानी पूरे उफान पर होता था, तब नाव में नदी पार कराने का मात्र एक रुपए लिया जाता था। कम पानी होने पर एक व्यक्ति का पच्चीस या पचास पैसे लिए जाते थे।
साफ हो जाता है कचरा
आसपास के लोगों का मानना है कि बीते कुछ वर्षो में अरपा में भले ही ज्यादा पानी नहीं आया है, लेकिन इतना काफी है कि किनारे में निगम द्वारा फेंके गए कचरे बह कर साफ हो जाते हैं।
काली के पैर छूने के बाद उतरता है पानी
पचरीघाट में मां काली समेत अन्य देवी-दवताओं का मंदिर है। पचरीघाट के लोगों का मानना है कि जब अरपा में बाढ़ आती थी, तब बाढ़ का पानी मां काली के पैर छूने के बाद उतर जाता था। मंदिर नदी की सतह से काफी ऊंची है। जब तक नदी का पानी मंदिर तक पहुंचता था, तब तक निचले इलाके जलमग्न हो जाते थे।
रातभर होता है एनाउंस
अरपा का जलस्तर बढ़ने पर जिला प्रशासन की ओर से बाढ़ नियंत्रण कक्ष की स्थापना की जाती है। रिक्शा में रातभर लाउडस्पीकर से एलाउंस कर जलस्तर बढ़ने की सूचना दी जाती है। दिन में भी किसी को नदी पार करने वाले लोगों को पानी का बहाव तेज होने की चेतावनी दी जाती है।
अरपा नदी का उद्गम पेंड्रा के पास एक खेत से हुआ है। कुछ विद्वान खोडरी के पहाड़ से इसका उद्गम बताते हैं। वहां से 147 किलोमीटर का सफर तय कर अरपा बरतोरी के ठाकुरदेवा के पास शिवनाथ नदी में जाकर मिलती है। बिलासपुर को दो भागों में विभक्त करने वाली अरपा को इस शहर की जीवन रेखा भी कहा जाता है।