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सूखे नलों के भी मीटर बदल दिए

जोधपुर. जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग ने पानी की सप्लाई पर नजर रखने और राजस्व उगाहने के लिए शहरी क्षेत्र में 23 हजार नए मीटर तो लगा दिए, लेकिन पानी का प्रेशर बढ़ाने की जहमत ही नहीं उठाई।

शहरी क्षेत्र को 525 लाख गैलन रोजाना पानी देने के दावे की हकीकत यह है कि 25 प्रतिशत इलाके में पानी का प्रेशर इतना कम होता है कि वह मीटर को छू तक नहीं पाता। ऐसी स्थिति में नए मीटर की उपयोगिता पर तो सवाल लगा ही है, विभाग के पास मीटर लगाने के बावजूद औसत आधार पर बिल भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

पीएचईडी ने बीते एक साल में अभियान चलाकर शहरी क्षेत्र में हजारों मीटर लगाए हैं। इनमें से शहर परकोटे में करीब साढ़े छह हजार मीटर ऐसे इलाकों में भी लगाए गए हैं जहां आम तौर पर पानी का प्रेशर नहीं होने से लोग मीटर के आगे लगी टी पर मोटर लगाकर जैसे तैसे पानी हासिल करते हैं। इन उपभोक्ताओं को अच्छे प्रेशर से पानी तो नसीब नहीं हुआ, लेकिन नए मीटर लगाने की एवज में बिल में 545 रुपए जुड़ कर जरूर आ गए।

क्या हैं मीटर लगाने के नियम
शहर में पेयजल वितरण करने वाले विभाग के अधिकारियों की बात मानें तो मीटर उसी इलाके में लगने चाहिए, जहां मुख्य लाइन से 7 मीटर घरों के अंदर तक पानी आ रहा हो। विभाग की राजस्व शाखा के अधिकारियों ने सप्लाई अनुभाग से तो इस मापदंड के मुताबिक कोई जानकारी ली ही नहीं। केवल टारगेट पूरा करने के चक्कर में ऐसे इलाकों में नये मीटर लगा दिए, पानी प्रेशर से आए सालों बीत गए।

आखिर चुप्पी का राज क्या है
विभाग ने शहरी क्षेत्र में नए मीटर लगाने का कार्य ठेके पर दिया था । ठेके को लेकर विभाग में इस बात की चर्चा आम है कि मीटर लगाने का ठेका विभाग के एक अधिकारी के रिश्तेदार को दिया हुआ है। ठेकेदार मीटर लगाने का कार्य निर्धारित मापदंड अनुसार कर रहा है अथवा नहीं? इस पर विभाग ने चुप्पी साध रखी है।

एक मीटर लगाने का खर्चा 50 रुपए
विभागीय अधिकारियों ने एक स्थानीय फर्म को प्रति मीटर करीब 50 रुपए के हिसाब से मीटर लगाने का ठेका दिया था। इस कार्य में ेंविभाग को 11.50 लाख रुपए का भुगतान करना पड़ेगा। विभाग ने मार्च 2008 तक शहरी क्षेत्र 23 हजार नए मीटर लगाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन मीटर लगाने का कार्य मई-जून माह तक जारी रहा।

असली मकसद तो पूरा नहीं हुआ

राजस्व बढ़ाना है, लेकिन बिना प्रेशर वाली जगहों पर मीटर लगाने के मामले में विभाग ने राजस्व बढ़ाने की अनदेखी कर दी। जाहिर है, जब मीटर पर रीडिंग आएगी ही नहीं तो असली खपत का पता नहीं चल पाएगा।

मजबूरन ऐसी जगहों पर विभाग को औसत आधार पर ही बिल भेजने पड़ रहे हैं। नए मीटर से पहले लगाई गई टी पर मोटर लगाकर जो उपभोक्ता पानी ले रहे हैं, विभाग उनसे पानी की खपत न्यूनतम 16 हजार लीटर मानते हुए भुगतान ले रहा है।

भविष्य में पानी का प्रेशर बढ़ेगा। इसे ध्यान में रखकर नए मीटर लगाने का कार्य शुरू किया गया है। जहां पानी का प्रेशर अभी नहीं है और लोग मीटर के आगे से पानी ले रहे हैं। ऐसे उपभोक्ताओ से न्यूनतम पानी के खर्च के हिसाब से ही राशि वसूली जा रही है।
—आरसी पुरोहित, अधीक्षण अभियंता, पीएचईडी।





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