जोधपुर. क्या वाकई जिस ग्वार-गम के निर्यात से हम दुनिया में अपनी धाक जमाए बैठे हैं, उसमें वैल्यू एडिशन से हम खुद करोड़ों बना सकते हैं और क्या मेडिसनल प्लांट की खान कहा जाने वाला एरिड जोन अपनी तकदीर खुद संवारने का माद्दा रखता है?
जोधपुर प्रवास पर आए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के डायरेक्टर जनरल डा. मंगला रॉय की राय में तो यह संभावनाएं मिलियन-बिलियन डॉलर की इंडस्ट्री कायम होने से कम नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि इस दिशा में हमने कदम बढ़ाया ही नहीं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अकाल की विभीषिका से अभिशप्त माने जाने वाले एरिड जोन पर भी ‘लक्ष्मी’ मेहरबान हो सकती है, मगर इसके लिए कोई एक फामरूला नहीं है। चाहे मेडिसनल प्लांट की फार्मिग हो या यहां का पशुपालन, इसे अपनाने वाले यदि अपनी सोच बदलें, प्रोडक्ट की प्रोसेसिंग या वैल्यू एडिशन पर ध्यान दें और मार्केटिंग की राह अपनाएं तो यह सब इतना मुश्किल भी नहीं है।
‘भास्कर’ ने ऐसी ही कुछ संभावनाओं को टटोला, कुछ विशेषज्ञों को इस ‘विजन’ से जोड़ा तो भविष्य की बेहतर तस्वीर नजर आई। काजरी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. सुरेश कुमार कहते हैं, ‘इसमें कोई दोराय नहीं कि हमारी वानस्पतिक संपदा बहुत समृद्ध है। यहां नैसर्गिक रूप से 34 ऐसी झाड़ियां हैं, जो अपने में बहुत से औषधीय गुण रखती हैं। इसके अलावा भी ऐसे ही गुणों से भरपूर वानस्पतिक प्रजातियों की यहां कोई कमी नहीं है। सवाल सिर्फ इन औषधीय प्रजातियों की व्यावसायिक खेती का है। यदि राज्य सरकार ऐसे पौधों की खेती के लिए समर्थन मूल्य घोषित करती है और प्रोसेसिंग यूनिट के अलावा एक्सपोर्ट प्रेरित मार्केटिंग का नेटवर्क बनाती है तो हम ग्लोबल मार्केट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकते हैं।’
क्षमता पहचाननी होगी
विशेषज्ञ बताते हैं कि हमारी सबसे बड़ी भूल क्षमता नहीं पहचानने की है। इसी का नतीजा है कि इस समय देश में जिन हर्बल प्रोडक्ट्स का आयात किया जा रहा है, उनमें 58 प्रतिशत भाग केवल दो प्रोडक्ट्स का ही है। इनमें एक है गम अरेबिका यानी गोंद। गम अरेबिका का बड़ा निर्यातक देश सुडान है, जबकि थार डेजर्ट में पाए जाने वाले कुमठ के पेड़ से हम अधिकाधिक उत्पादन लेते हुए न केवल आत्मनिर्भर बन सकते हैं, बल्कि निर्यात की स्थिति में भी आ सकते हैं।
यही हाल एक्सपोर्ट का भी है। जिन हर्बल प्रोडक्ट्स का सर्वाधिक एक्सपोर्ट होता है, इनमें तीन वनस्पतियां इसबगोल, सोनामुखी तथा मेहंदी मुख्य हैं। हालांकि इनके उत्पादन में राजस्थान का प्रमुख स्थान है, लेकिन अन्य राज्य भी एक्सपोर्ट में भागीदारी निभाते हैं। राज्य के सोजत में 28 हजार हैक्टेयर में मेहंदी की खेती से उत्पादक व विक्रेता हर साल 40 करोड़ की आमदनी करते हैं, क्योंकि इस मेहंदी में 1 से 1.2 प्रतिशत तक लासोल होता है।
कमोबेश यही स्थिति सोनामुखी की है, जिसकी जापान, वेनेजुएला व यूरोप में जबर्दस्त मांग है। इसी कारण हर साल 33 करोड़ से ज्यादा का एक्सपोर्ट होता है। इस तरह प्रमुख उत्पादक होने के बावजूद हम प्रमुख एक्सपोर्टर नहीं बन पा रहे, जबकि ऐसा होने पर राज्य की अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव आ सकता है।
यह सही है कि औषधीय महत्व के उत्पादों का वैल्यू एडिशन किए बिना उनका सही मूल्य नहीं मिल सकता। ग्वारपाठा का उदाहरण हमारे सामने हैं, आज इसके कई उत्पाद बाजार में है। हमें कोशिश करनी चाहिए कि ऐसे उत्पादों की फार्मिंग के साथ उनके विपणन व विक्रय का तंत्र विकसित किया जाए, ताकि किसान को सही मूल्य मिल सके।
—बनवारीलाल गौड़, कुलपति, राजस्थान आयुर्वेदिक यूनिवर्सिटी