उदयपुर.
रविवार की रात, सवा बजे का समय जब शेष शहर नींद के आलम में था, प्रतापनगर पेट्रोल पंप के पास दिवाली जैसा जश्न, खुशी का आलम, श्रद्धालुओं की भीड़ और तुमुल जयघोष, जमकर आतिशबाजी, ढोल-नगाड़ों का वादन.. आंखों में चमक और हृदय में ‘आज्ञा भई अकाल की तभै चलायो पंथ, सब सिक्खन को हुकम है गुरु मानियो ग्रंथ’ के भाव से उल्लास का अतिरेक.. खुशी की लहर ऐसी कि श्रद्धालु सड़क पर लौट गए और धूलियों की घाटी से ग्लासफैक्ट्री, सुंदरवास, ठोकर चौराहा और सिख कॉलोनी तक धीरे-धीरे यह लहर फैलती ही चली गई। मौका था गुरु मानियो ग्रंथ जागृति यात्रा के आगमन का।
उदयपुर में यह पहला ही मौका होगा जबकि दिनों के संधिकाल के बाद, रात्रि में ऐसा शानदार जश्न हुआ हो। हर मुंह पे ‘वाहे गुरुजी का खालसा, वाहे गुरुजी की फतह..’, ‘हर वेला हरदम गुरु दे नाल, तीन सौ साल, गुरु दे नाल..’ का कीर्तन था।
काफिले के आगे और पीछे भीड़ ही भीड़। न केवल जवान और बुजुर्ग, बच्चे और महिलाएं भी सड़क पर थीं। यात्रा के 2008 अंक वाले रथ के आगे पंज प्यारे, उसमें विराजित गुरु ग्रंथ साहिब की प्राचीन बीड़ और गुरु गोविंदसिंह सहित तत्कालीन रणबांकुरों के आयुध.. स्वागत का जबर्दस्त अंदाज, आस्थाओं की हिलोर, कोई दौड़-दौड़कर सेवा का लाभ लेने में लगा था तो कोई आगे-आगे लौटकर बलैयां ले रहा था, निहाल हो जाने के भाव से समर्पण का अंदाज पूरे मार्ग में दिखाई दिया। पीछे हर गाड़ी पर ध्वज, निशान था।
गुरता गद्दी के 300वें साल के उपलक्ष्य में सिख गुरुओं की शिक्षाओं को प्रचारित करने के लिए निकली गुरु मानियो ग्रंथ-जागृति यात्रा चित्तौड़गढ़ से रविवार करीब सवा बजे लेकसिटी पहुंची। प्रवेश होते ही न केवल सिख बल्कि अन्य समुदायों के श्रद्धालुओं ने तुमुल जयघोष कर अगवानी की और दर्शन किए, मत्था टेका। प्रतापनगर चौराहे पर सिंधी पंचायत आदि संगठनों की ओर से स्वागत, सत्कार किया गया। यहां गुरुद्वारा नानक दरबार पर यात्रा का स्वागत हुआ।