bhaskar Web English
HomeNewsPunjabAmritsar Amritsar

टायलेट के पानी से बनाते हैं चाय!

अमृतसर. tea पीने के लिए चाय में टायलेट का पानी, घटिया डिप-टी, खाने के लिए गंदा लूज खाना, बिछाने को न चादर, न सोने को तकिया, ओढ़ने को घटिया कंबल, विकलांग कोच पर वैंडरों का कब्जा..। अमृतसर और सहरसा के बीच दौड़ रहे देश के पहले गरीब रथ की यह दुर्दशा होगी, शायद रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने ख्वाब में भी ऐसा नहीं सोचा होगा।

लालू ने गरीबों की स्लीपर के किराए में एसी की ठंडक देने के लिए गरीब रथ चलाने का सपना संजोया था। अक्तूबर सन् 2006 में वह सपना हकीकत बना, जब उन्होंने खुद हरी झंडी दिखाकर सहरसा से अमृतसर के लिए उसे रवाना किया। अब रेलवे के कारिंदे ट्रेन के गरीबों का खुलकर शोषण कर रहे हैं, और अधिकारी बैठे हैं चुप्पी साधे।

13 स्लीपर और 6 चेयरकार की ट्रेन में सबसे आगे और सबसे पीछे एक-एक पावर कार (जनरेटर कोच है)। इन दोनों कोचों में गार्ड के कैबिन के अलावा चार-चार स्लीपर विकलांगों के लिए हैं, लेकिन ये सीटें उन्हें न देकर खान-पान स्टाफ को अलाट कर दी जाती हैं।

चूंकि ट्रेन में पैंट्री कार अलग से नहीं है, इसलिए यात्रियों को खाना देना इसी स्टाफ की जिम्मेदारी है। इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कारपोरेशन (आईआरसीटीसी) की छत्रछाया में चल रही ट्रेन में यात्रियों को पैक खाना देना जरूरी है, पर अंदर होता क्या है, उसकी सच्चई इसमें सफर करने वाले यात्री हीं बयां करते हैं।

व्यापार के सिलसिले में अक्सर इससे सफर करने वाले संजय कपूर और उनके साथियों ने बताया ठेकेदार के कारिंदे बीच के स्टेशनों से पका हुआ लूज खाना ट्रेन में चढ़ाते हैं और खुद ही डिब्बों में इस कदर पैक करते हैं कि देखने के बाद खाने का मन ही नहीं करता, जबकि बीच के स्टेशनों से डिब्बों में पैक खाना बांटने की ही मंजूरी है। खाने के साथ पानी का पैक गिलास मुफ्त में देना होता है, लेकिन उसकी जगह पानी की बोतलें बेची जाती हैं, जिसे खरीदना यात्रियों की मजबूरी बन जाती है।

एक पूर्व रेलवे कर्मचारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया एक अटैंडेट के जिम्मे दो स्लीपर कोचों में 150 सीटें हैं, पर उसके पास बैडिंग सिर्फ 50 ही होते हैं। वह भी इतने घटिया और मैले कि मारे बदबू के दम घुटता है। रेलवे का कंबल प्लेन गहरे बादामी रंग का होता है, लेकिन यात्रियों को पतला व फटा रंग-बिरंगा शौडी कंबल दिया जाता है।

हद तो यह है ट्रेन के सफाई कर्मी खाना बेचते हैं। चाय बनाने के लिए टायलेट का पानी इस्तेमाल होता है। चाय की डिप इतनी निम्न क्वालिटी की है कि पीते ही उल्टी होने को होती है। चाय के गिलास सफेद तो होते हैं, पर उन पर आईआरसीटीसी नहीं लिखा होता। इस संबंध में स्थानीय किसी भी अधिकारी ने मुंह न खोलने में ही भलाई समझी।

ठेकेदार से मांगेंगे जवाब
रेलवे के सीनियर डिवीजनल कमर्शियल मैनेजर बृजेश धिरमाणी ने कहा कि वाकई यह दुखदायी है। इस संबंध में ट्रेन के ठेकेदार सेजवाब तलब किया जाएगा। भविष्य में ऐसा न हो, इसकी व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड:
 

आपके विचार
alok upadhyay
Tuesday, 1st Jul 2008, 17:01
It is not possible with out the help of railways employee,this is the clear sign of courreption.
lokesh pal
Tuesday, 1st Jul 2008, 18:28
mai ek nri hoo.saal mai ek baar india jaata hoo.railway minister kee itnee tareef soonee the kee socha mai bhi is baar train se safar karoo. mager jo is safer ke doraan dekha usse ye lagta hai jaise laloo ji raat din ek karke railway ko uppar la jaana chate hai.railway ka staaf utna hi ise neeche kee taraf la ja raha hai. kisee bhi poochtaach counter par aap baat kare hamesa glat tareeke se baat karte log milege.mai to bolta hoo laloo ji ko har railway staiton par camre lagane chaiye jisse in sabke orignality pata chle. laloo ji wase hame aap par garve hai.sabse kacda dipartmant ko aap itna to kam se kam la hi sake.