जयपुर. दीनदयाल उपाध्याय ट्रस्ट से संबंधित एक प्रकरण में शहर की एसीजेएम क्रम-2 कोर्ट ने गांधीनगर थाने के तत्कालीन थानाधिकारी से पूछा है कि कोर्ट के आदेश के बाद भी अभी तक एफआईआर दर्ज कर जांच की कार्रवाई शुरू क्यों नहीं की गई है।
थानाधिकारी को 31 जुलाइ, 2008 को कोर्ट में पेश होने के साथ स्पष्टीकरण देने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने ये आदेश श्रीगंगानगर निवासी कृष्ण कुक्कड़ की ओर से दायर परिवाद पर सुनवाई करते हुए दिए।
मामले की पुन: सुनवाई पर कोर्ट ने कहा कि पत्रावली के अवलोकन से प्रतीत होता है कि यह परिवाद कोर्ट द्वारा गांधी नगर थाने को दर्ज कर जांच के लिए भेजा गया था। परंतु पत्रावली के अवलोकन से ये स्पष्ट है कि अभी तक इस मामले में एफआईआर दर्ज नहीं हुई है।
क्या कहते हैं कोर्ट के निर्णय
राजस्थान हाईकोर्ट ने सोहन लाल बनाम राजस्थान सरकार प्रकरण में कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता 1974 की धारा 156 (3) के अंतर्गत जब मजिस्ट्रेट आदेश पारित करता है तो ये माना जाता है कि धारा 190 के अंतर्गत प्रसंज्ञान पहले ही लिया जा चुका है। इसलिए यदि मजिस्ट्रेट धारा 156 (3) के अंतर्गत आदेश पारित करता है तो थानाधिकारी मामले को पंजीकृत करने से इनकार नहीं कर सकता।
मुख्यमंत्री द्वारा पद के दुरुपयोग की थी शिकायत
इस प्रकरण में परिवादी ने 9 नवंबर, 2006 को कोर्ट में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, तत्कालीन नगरीय विकास मंत्री प्रताप सिंघवी, जेडीए आयुक्त, महापौर अशोक परनामी, अजयपाल सिंह व ललित किशोर चतुर्वेदी के खिलाफ परिवाद दायर किया था।
परिवाद में कहा गया दीनदयाल ट्रस्ट को सस्ती दर पर जमीन आवंटित कर सभी ने अपने पद का दुरुपयोग किया है। साथ ही इस ट्रस्ट से ये अपने पद का अनुचित लाभ लेंगे। इस परिवाद पर कोर्ट ने 10 नवंबर को गांधीनगर के थानाधिकारी को एफआईआर दर्ज कर जांच के आदेश दिए थे, किन्तु न तो एफआईआर ही दर्ज हुई और न ही जांच।
खुद पदाधिकारी होते ट्रस्ट को आवंटित करवा ली थी जमीन
दीनदयाल उपाध्याय ट्रस्ट में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने ट्रस्टी होते हुए दो साल पहले बेशकीमती जमीन कौड़ियों के भाव आवंटित करवा ली थी। बाद में यह मामला उछलने और कोर्ट में जाने के कारण ट्रस्ट के नाम जमीन आवंटित कराने का फैसला रद्द कर दिया गया। इस ट्रस्ट की जमीन पर भाजपा का प्रदेश मुख्यालय बनाए जाने की योजना थी।