नई दिल्ली. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता एबी वर्धन ने मनमोहन सरकार को बड़ी राहत देते हुए संकेत दिए कि उनकी सरकार को फिलहाल कोई खतरा नहीं है। उन्होंने कहा कि शुक्रवार को समर्थन वापसी जैसा कुछ नहीं होगा। सरकार जी-8 की बैठक में भाग ले सकती है।
वर्धन का यह बयान वामदलों में फूट का इशारा कर रहा है, क्योंकि माकपा शुरू से ही कहती रही है कि प्रधानमंत्री जी-8 की बैठक में शामिल होते हैं तो इसे करार की दिशा में आगे बढ़ना माना जाएगा और हम उसी दिन समर्थन वापस ले लेंगे।
बहरहाल यूएनपीए की मुख्य घटक समाजवादी पार्टी ने करार पर अपने पत्ते नहीं खोलते हुए बुधवार को मांग की है कि प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से देश की शंकाओं का समाधान करें। सपा नेता अमर सिंह ने पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव के साथ यहां राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन से मुलाकात के बाद इस आशय के विचार जताए।
अमर सिंह ने कहा कि उन्होंने नारायणन के सामने अपनी शंकाओं को रखा और नारायणन ने उनका समाधान किया। हालांकि अमर सिंह ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वे नारायणन के जवाब से संतुष्ट हैं या नहीं। उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि वे पत्रकारों के माध्यम से कुछ नहीं कहना चाहते। अमरसिंह ने आरोप लगाया कि भाजपा ने मनमोहन सरकार को गिराने की साजिश रची थी। अमरसिंह ने कहा कि जसवंत सिंह ने जयललिता के माध्यम से यह संदेश पहुंचाया था कि अगर सपा सरकार गिराने में मदद करे तो बदले में मुलायम को प्रधानमंत्री बनवाया जा सकता है।
यूएनपीए की गुरुवार को प्रस्तावित बैठक में चर्चा के बाद ही वे अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे। तेलुगु देशम पार्टी, असम गण परिषद और इंडियन नेशनल लोकदल ने करार पर अपनी आपत्ति पहले ही जता दी है। बैठक से ठीक पहले समाजवादी पार्टी के मुजफ्फर नगर के सांसद मुनव्वर हसन ने भी करार को मुस्लिम विरोधी बताते हुए बगावत के संकेत दिए हैं। इससे पहले, सिंह ने अपने वोट बैंक तथा सरकार को बचाने की जद्दोजहद के बीच करार के बजाय धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एकजुट करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए बीच का रास्ता निकालने के संकेत दिए।
सपा नेता ने दावा किया कि माकपा महासचिव प्रकाश करात से मुलाकात के दौरान उन्होंने उनसे सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ एकजुट होने का आग्रह किया था। अमर सिंह के मुताबिक, करात भी समय से पहले चुनाव के खिलाफ दिखे।
करार के समर्थन के बारे में पूछे गए सवालों का जवाब अमर सिंह बड़ी सफाई से टाल गए। सपा के बदलते रुख और पार्टी की कांग्रेस से नजदीकियां बढ़ने के संकेतों के बीच गुरुवार की बैठक से पहले यूएनपीए में कुछ दरारें नजर आने लगी हैं।
इस बैठक पर वामदलों की भी निगाहें लगी हैं। भाकपा नेताओं एबी वर्धन और शमीम फैजी ने दावा किया कि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में वे अकेले नहीं है। यदि यूएनपीए करार के विरोध में आगे आता है तो सरकार इस मुद्दे पर अल्पमत में रह जाएगी।
गर्म रहे गलियारे
अमर सिंह की सरगर्मी
अमर सिंह बुधवार को सबसे पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन से मिले। इससे जहां सरकार को समर्थन देने की बातों को बल मिला वहीं खुद अमर सिंह ने वामपंथी नेताओं को भरोसा दिलाया कि सपा केवल संसद के भीतर सरकार को समर्थन करेगी और जनता के बीच समझौते का विरोध करेगी। कुल मिलाकर सपा चुनावों के बाद गैर भाजपा, गैर कांग्रेसी तीसरे मोर्चे की परिकल्पना के लिए दरवाजे बंद नहीं करना चाहती।
सपा : 39 सांसद नुकसान>> तीसरा मोर्चा न टूट जाए। मुस्लिम वोट प्रभावित हो सकते है।
नफा>> सरकार गिरने से रोकने पर सियासी हैसियत बढ़ेगी। ठ्ठ उप्र में बसपा के खिलाफ कांग्रेस के साथ गठबंधन बन सकता है। >> तीसरे मोर्चे के वोट बैंक का रास्ता तो खुला है ही।
कांग्रेस : 153 सांसद
>> कांग्रेस का मानना है कि वामपंथी दल समर्थन वापस लेते हैं तो मुलायम की समाजवादी पार्टी साथ में आ जाएगी और सरकार बच जाएगी।
>> जनता को बता सकती है कि हमने सिद्धांत के साथ समझौता नहीं किया।
भाजपा : 130 सांसद
रणनीति- सरकार के खिलाफ करार का विरोध कर अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करेगी। >> सबसे ज्यादा फायदे में एनडीए ही रहेगी। एन्टी इनक्मबेंसी फैक्टर का लाभ। >> एनडीए में एका बढ़ेगा। >> तीसरे मोर्चे का एका टूटेगा और तेलुगुदेशम के तौर पर बड़ा सहयोगी मिल जाएगा।
बसपा : 17 सांसद
फायदा>> मुस्लिम वोटों का फायदा। मायावती ने कहा है कि परमाणु करार मुस्लिम विरोधी है। >> वामपंथी पाटिर्यो का सहयोग मिल सकता है, क्योंकि बसपा ने ईरान गैस पाइपलाइन का समर्थन किया है।
- ‘मेरा मानना है कि वामदल सरकार को नुकसान पहुंचाने वाली कोई बात नहीं करेंगे। वे सांप्रदायिक शक्तियों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ेंगे।’
- टीआर बालू, द्रमुक नेता और केंद्रीय मंत्री