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नई हास्य फिल्म है ‘हे गुज्जू’

परदे के पीछे.स्टूडियो 18 के लिए सतीश कौशिक हिमेश रेशमिया अभिनीत ‘हे गुज्जू’ प्रारंभ करने जा रहे हैं। इसमें हिमेश दोहरी भूमिकाओं में है- शेयर ब्रोकर करसन लाल और अप्रवासी भारतीय आकाश पटेल। अमेरिका में गुजराती लोग बड़ी संख्या में मौजूद हैं और सफल व्यवसायी भी हैं।

विदेश क्षेत्र का व्यवसाय अब किसी भी भारतीय फिल्म वितरण क्षेत्र से दोगुना हो चुका है। ऐसे में गुजराती पात्रों को फिल्म में शामिल करना शुभ माना जा रहा है। दरअसल हिंदुस्तानी सिनेमा में गुजरात का सहयोग तो प्रारंभ से ही रहा है जब द्वारकादास सम्पत ने दादा फाल्के के ‘प्रयास’ में आंशिक धन लगाया था।

इस उद्योग में बॉक्स ऑफिस ही सारे मूल्य और सिद्धांत स्थापित करता है और तोड़ता भी है। मल्टीप्लैक्स ने मनोरंजन उद्योग में सबसे अधिक परिवर्तन प्रस्तुत किए और पहला मल्टीप्लैक्स भी गुजरात में ही बना था।

बहरलाल सतीश कौशिक हिमेश के साथ सुभाष घई की ‘कर्ज’ का नया संस्करण भी बना रहे हैं और इसके अधिकार के लिए घई को दो करोड़ रुपए दिए गए हैं जिसका दस प्रतिशत भी वह लाभ नहीं था जो ‘कर्ज’ ने कमाया। हॉलीवुड की रिइनकारनेशन ऑफ पीटर प्रॉउड से सुभाष घई ने प्रेरणा ली थी और उस गरीब को कभी कुछ नहीं मिला। मौलिक रचनाओं के लिए कभी कुछ नहीं मिलता।

बहरहाल सतीश कौशिक अन्य भाषाओं की फिल्मों के हिंदी संस्करण हमेशा बनाते रहे हैं और उन्हें फिल्मों के मुंबईयाकरण में महारत हासिल है। सफलता के कितने नए क्षेत्र खुल गए हैं। इसीलिए यह भी संभव है कि ‘हे गुज्जू’ गुलजार की ‘अंगूर’ से प्रेरित हो जो शेक्सपीयर के ‘कामेडी ऑफ एरर्स’ पर आधारित थी और इसी कथा पर आधारित विमल राय की ‘दो दूनी चार’ में गुलजार सहायक थे। ‘अंगूर’ में संजीव कुमार ने जिस कुशलता और भावप्रवणता से दोहरी भूमिकाएं निभाई थीं, उसका आधी प्रतिशत भी हिमेश कर पाए तो उनका जीवन सार्थक हो सकता है।

हिमेश की पहली फिल्म ‘आपका सुरूर’ कामयाब फिल्म थी। गायक-संगीतकार के रूप में हिमेश पहले ही स्थापित हो चुके थे। बतौर अभिनेता पहली फिल्म की सफलता के बाद भी उनके पास कोई प्रस्ताव नहीं आए क्योंकि उसे एक इत्तेफाक ही माना गया। टी सीरीज वाले मूलत: संगीत बेचने का काम करते हैं, अत: उन्हें हिमेश के साथ ‘कर्ज’ का नया संस्करण बनाने की सूझी। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आनंद बक्षी ने कमाल किया था।

इसका एक गीत था, ‘शायर बनाया आपने, दर्दे दिल दर्दे जिगर दिल में जगाया आपने।’ शाहरुख खान ने भी ‘ओम शांति ओम’ में ‘कर्ज’ से कुछ लिया था परंतु फरहा खान के कहने पर जावेद अख्तर जैसे गीतकार ने ‘दर्दे डिस्को’ जैसी फूहड़ रचना की और अब दर्द के साथ कुछ भी जोड़ने का फैशन ही हो गया है। दर्द को फूहड़ और अर्थहीन कर दिया। आजकल लम्हें के साथ लेजी लगाया जाता है।





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