आलेख.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के लगभग चार दशकों में साम्यवादी खेमे के विघटन के साथ ही पुराने गठबंधनों के ढांचे भी ध्वस्त हो गए और कुछ वष्रो तक ऐसा लगा कि उनका स्थान लेने के लिए नए ढांचे खड़े करने की शायद जरूरत न पड़े।
ऐसा सुहाना संसार सृजित होने के लिए आवश्यक था कि संसार की एकमात्र सुपर पावर अपने पूरे जतन से हमारे ऋषियों के ‘वसुधव कुटुम्बकम’ के आदर्श को साकार करने की चेष्टा करती। किंतु दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हुआ क्योंकि अमेरिका के दक्षिणपंथियों ने समूचे विश्व पर हावी होने के दिवास्वप्न देखने की राह अपनाई।
इस संकीर्ण सोच वाली नीति का सबसे पहला परिणाम तो हुआ पश्चिमी सभ्यता वाले राष्ट्रों के बीच गंभीर मतभेदों का उभरना। इस प्रकार ‘एक संसार’ की वह अवधारणा जो अमेरिकी राष्ट्रपति पद के १९४४ के चुनावों के रिपब्लिकन प्रत्याशी वेंडल विल्की ने अपनी १९४३ की पुस्तक ‘वन वर्ल्ड’ में प्रस्तुत की थी, वह मात्र आकांक्षा ही बन कर रह गई और विश्व अपनी पुरानी प्रतिद्वंद्वी खेमों वाली कलह और बर्बादी की राह पर फिर से चल पड़ा।
इस बार लड़ाई राष्ट्रों मात्र की न होकर सभ्यताओं की है, ऐसा ऐलान किया है प्रोफेसर हंटिंगटन ने अपनी बहुचर्चित किताब ‘द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस’ में। उनके अनुसार अगली लड़ाई जो संभवत: जारी भी हो गई है, अमेरिका को या समूचे पश्चिम को लड़नी होगी इस्लामिक अतिवाद से। यानी ईसाई सभ्यता को इस्लामी सभ्यता से और एक और लड़ाई संभवत: लड़ी जाएगी श्वेत सभ्यता और पीली (चीनी) सभ्यता के बीच।
शायद इसी परिपेक्ष्य में अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने अपने एक कुख्यात भाषण में दुष्टता की धुरी (ऐक्सिस ऑफ इविल) की अवधारणा का उद्घोष किया था। उन्होंने जिन तीन देशों को इस ‘धुरी’ का सदस्य बताया था वे थे ईरान, इराक और उत्तरी कोरिया। इनमें से पहले दो तो मुस्लिम देश हैं तो तीसरा पीली नस्ल के लोगों का देश है। इतना ही नहीं, अमेरिका में कई प्रभावशाली दक्षिणपंथी हल्कों में चीन से निबटने की मांग खुले आम व्यक्त की जा रही है।
वास्तव में २१वीं सदी में विशाल गठबंधनों और धुरियों के स्थान पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में त्रिकोणों का जोरदार प्रादुर्भाव हुआ है। उक्त दुष्टता के त्रिकोण के अलावा दो अन्य महत्वपूर्ण त्रिकोण हैं अमेरिका, चीन व भारत का और दूसरा भारत, चीन और रूस का।
यानी आज की एकमात्र सुपर पावर और अपने विघटन से पूर्व उसकी प्रतिद्वंदी रही दूसरी सुपर पावर, उभरती हुई दोनों महाशक्तियों- चीन व भारत के साथ मिलकर विश्व मंच पर अपना-अपना खेल खेलने के जुगाड़ में हैं। रूस कितना भी कमजोर क्यों न हो गया हो फिर भी उसके पास जो विशाल एटमी शस्त्र व मिसाइलों का भंडार है उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
चीन की गत दो दशकों के बीच अर्जित आर्थिक प्रगति के पीछे अथवा उसके साथ-साथ कदम बढ़ाती हुई सामरिक तकनीक की छलांगें भी कम चौंकाने वाली नहीं हैं और भारत भी मानो ये दिखाने पर तुला है कि ‘हम भी किसी से कम नहीं!’ अमेरिका चीन के विरुद्ध संतुलन बनाने का सहारा देखता है भारत में।
भारत चीन के विरुद्ध शक्ति का साधन ढूंढ़ सकता है, अमेरिका में भी और रूस में भी। चीन भी अपनी महाशक्ति की पहचान की छाप छोड़ने के लिए न केवल अपने दोनों बड़े पड़ोसियों के साथ बल्कि ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ में जुटे, प्रशांत महासागर के पार स्थित महाशक्ति अमेरिका के साथ भी इस ताकत व प्रभाव का खेल खेलने में क्या किसी से पीछे रह सकता है?
अत: भारत को भी शक्ति का यह अपरिहार्य खेल अत्यंत सूझबूझ के साथ खेलना होगा। इसी संदर्भ में उल्लेखनीय है एक अन्य त्रिकोण, जिसमें हमारे अपने दक्षिणपंथी गांधी व नेहरू के मूल्यों वाले देश को घसीटने का सतत प्रयास करते रहे हैं। उनके विश्व दृश्य में इजरायल-शायद एक स्वाधीन महाशक्ति है, जबकि वास्तविकता वैसी नहीं है।
वे चाहते हैं कि भारत को इजरायल व अमेरिका के साथ त्रिकोण बनाकर चलना चाहिए। यह सुझाव एकदम अर्थहीन इसलिए है कि इसका असली परिणाम होगा भारत को अमेरिकी-इजरायल धुरी का पिछलग्गू और बेवजह ही लगभग समस्त मुस्लिम जगत का घोषित शत्रु बना डालना। इजरायल व अमेरिका दोनों के साथ ही हमारे द्विपक्षीय संबंध अच्छे हैं। अत: उन्हें सुदृढ़ करना एक बात है और अनुयायी बनना कुछ और।
इस सबसे परे एक विचारणीय बात यह भी है कि शक्तियों की शत्रुताओं के तराजू पर टिके त्रिकोणों को क्या कल के विश्व में शांति और प्रगति का शक्तिशाली हथियार बनाया जा सकता है? यदि मानवता के कल के नेता ऐसा करें और उसमें सफल हों तभी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वर्णिम विश्व निर्मित हो सकता है।
लेखक दिल्ली सरकार के पूर्व मुख्य सचिव हैं और इन दिनों अमेरिका में रह रहे हैं।