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करार की भेंट क्यों चढ़े साइरस!

दृष्टिकोण. deal यह आज भी एक बड़ा रहस्य है कि हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को परमाणु करार से इतना लगाव क्यों है। पिछले कुछ समय से ऐसा कोई हफ्ता या महीना नहीं गुजरा, जब देश को नाभिकीय ऊर्जा के फायदों के बारे में उन्होंने न बताया हो। लेकिन यह मनमोहन सिंह ही थे जिन्होंने 1991-95 के दौरान वित्त मंत्री के तौर पर देश के परमाणु कार्यक्रम को फंड के लिए तरसाया, जिससे नई परियोजनाएं कमजोर हुईं और यूरेनियम अनुसंधान का काम रुका।

आज देश जिस तरह यूरेनियम की कमी से जूझ रहा है, उसके मूल में यही बात है कि वित्त मंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह ने जो कार्यक्रम चलाए, उनका प्रभाव उनके ऑफिस छोड़ने के कई साल बाद तक रहा।

आज देश को यह जानने का हक है कि क्या डॉ. सिंह का नाभिकीय ऊर्जा संबंधी नया लगाव आयात पर केंद्रित है? उनकी सरकार के मौजूदा 2008-09 के लिए पेश किए गए बजट से यह चिंता और बलवती होती है, जिसमें परमाणु ऊर्जा विभाग के वित्त में 529 मिलियन डॉलर की कटौती की गई है।

इसके अलावा अमेरिका के साथ विवादास्पद परमाणु करार के तहत देश के दो बम-ग्रेड प्लूटोनियम उत्पादन करने वाले रिएक्टर्स में से एक को वर्ष 2010 तक बंद करने का प्रधानमंत्री का निर्णय भी विस्मयकारी है। देश में वेपन-ग्रेड प्लूटोनियम के कुल ऐतिहासिक उत्पादन का ज्यादातर हिस्सा वर्ष 1960 से चल रहे साइरस प्लांट से ही आया।

असल में साइरस का लाखों डॉलर की लागत से नवीनीकरण किया गया और इसे दोबारा शुरु हुए बमुश्किल दो साल ही हुए थे कि प्रधानमंत्री ने इस रिएक्टर को बंद करने की आश्चर्यजनक ढंग से घोषणा कर दी। प्रधानमंत्री ने 10 मार्च 2006 को लोकसभा में कहा कि ‘भले ही साइरस रिएक्टर का हाल ही में नवीनीकरण हुआ था, इसके बंद होने से पहले ही हमें आइसोटोप(प्रोडक्शन)और किए जाने वाले अनुसंधान से ही इससे जुड़ी लागत से कहीं अधिक मिल जाएगा।’

लेकिन डॉ. सिंह ने अब तक इस अहम सवाल का जवाब नहीं दिया: आखिर वे उस रिएक्टर को लेकर अमेरिकी दबाव में क्यों आ गए जो देश के सामरिक कार्यक्रम के लिहाज से काफी अहम है? देश में न सिर्फ अपने मुख्य विरोधी चीन के खिलाफ भरोसेमंद न्यूनतम परमाणु निरोधी क्षमता का अभाव है, वरन मौजूदा अंतरराष्ट्रीय आकलन के मुताबिक भारत की परमाणु अस्त्र के लिहाज से जरूरी नाभिकीय सामग्री की संग्रहीत मात्रा पाकिस्तान के मुकाबले थोड़ी ही अधिक है।

पाकिस्तान परमाणु सैन्य कार्यक्रम के लिए एक सेकंड रिसर्च रिएक्टर और नई रीप्रोसेसिंग यूनिट बना रहा है। इनमें कामकाज शुरू होने से पाकिस्तान की वेपन-ग्रेड प्लूटोनियम निर्माण क्षमता काफी बढ़ जाएगी। यदि परमाणु करार के बाद अगले दो साल में साइरस रिएक्टर को बंद कर दिया जाता है तो देश के परमाणु सैन्य कार्यक्रम के लिए वेपन-ग्रेड प्लूटोनियम की आपूर्ति मौजूदा स्तर से एक-तिहाई तक घट जाएगी। बेशक, भारत एक रिप्लेसमेंट रिएक्टर बना सकता है लेकिन उसके लिए काफी समय की जरूरत है।

बिजली बनाने वाले रिएक्टर्स में जले र्इंधन से पैदा होने वाला प्लूटोनियम परमाणु अस्त्रों के लिहाज से घटिया स्तर का होता है। इसलिए मिलेट्री-ग्रेड प्लूटोनियम के लिए भारत अपने दो रिसर्च रिएक्टरों- साइरस और ध्रुव पर निर्भर है। लेकिन ध्रुव रिएक्टर में शुरुआत में काफी दिक्कतें आईं, जिनके निवारण में कई साल लग गए। यही कारण है कि ४क्-मेगावाट क्षमता वाले साइरस का देश के वेपन-ग्रेड प्लूटोनियम के ऐतिहासिक उत्पादन में ज्यादा योगदान है।

दरअसल साइरस को बंद करने के लिए नई दिल्ली पर दबाव डालने के पीछे अमेरिका का उद्देश्य भारत की परमाणु-निरोधी योजनाओं को सीमित करना है। यदि भारत भविष्य में परीक्षण करता है तो अमेरिका को न सिर्फ सभी साझा कार्यक्रमों को खत्म करने का अधिकार होगा, वरन उसने जो आपूर्ति की होगी, उसे वापस मांगने का भी अधिकार होगा।

वर्ष 1974 में हुए परमाणु परीक्षण के लिए प्लूटोनियम की आपूर्ति का स्रोत साइरस रिएक्टर 1956 में हुए दो अलग-अलग अनुंबधों के तहत कनाडा की तकनीकी मदद से बना और इसे अमेरिका से हैवी वाटर मिला। चूंकि यह अनुबंध 1957 में गठित अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी(आईएईए) और 1968 में परमाणु अप्रसार संधि के मसौदे को अंतिम रूप देने से पहले हुए थे और अंतरराष्ट्रीय ‘सुरक्षा मानक’ (जांच-पड़ताल) की अवधारणा तब तक नहीं बनी थी, लिहाजा भारत पर उस वक्त परमाणु-विस्फोट न करने की कोई बंदिश नहीं थी।

वस्तुत: साइरस रिएक्टर के अस्तित्व में आने के तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने खुले तौर पर कहा था- ‘हम ऐसे स्तर पर पहुंच रहे हैं जहां हमारे लिए.. परमाणु हथियार बनाना मुमकिन है।’ इसे बंद करने के निर्णय से अमेरिका और कनाडा की परमाणु अप्रसार लॉबी यह कहते हुए जश्न मना सकती है कि भारत ने दबे सुर में यह मान लिया है कि 1974 में इसका परमाणु परीक्षण करना पाप था और इसके प्रायश्चित में वह साइरस को बंद कर देगा।

सामरिक कार्यक्रम से समझौता करने के अलावा डॉ. सिंह का यह कदम उन अंतरराष्ट्रीय(और यहां तक कि आधिकारिक अमेरिकी) वैध मतों का उपहास उड़ाता है जिनमें भारत को साइरस के किसी गलत काम में लिप्त होने के संबंध में क्लीनचिट दी गई है। अमेरिकी गृह विभाग 2 जून 1974 को कांग्रेस के निर्धारण में खुद इस नतीजे पर पहुंचा कि चूंकि हैवी वाटर प्रतिवर्ष 10 फीसदी के हिसाब से घटता है और भारत का नांगल प्लांट 1962 से हैवी वाटर का निर्माण कर रहा है, लिहाजा ‘मान सकते हैं कि अमेरिकी-मूल का हैवी वाटर इस स्रोत से प्रतिस्थापित हो गया था।’

आखिरकार, पूरी तरह नवीनीकृत रिएक्टर के तौर पर साइरस उसी तरह भारतीय उपक्रम है जैसा कोई और। साइरस को बंद करने का मनमोहन सिंह का निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि किस तरह अमेरिका आज दशकों बाद भारत को उस सुविधा से लाभ नहीं उठाने देना चाहता, जो सुरक्षा-मानकों के दौर से पहले से संबंधित है। इससे यही संदेश जाता है कि वाशिंगटन न तो कभी भूलता है और न माफ करता है।

लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।





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