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रियलिटी शो की निर्मम रियलिटी

संपादकीय. ग्लैमर और शोहरत की चमकदार दुनिया के पीछे का अंधेरा और त्रासदी कभी-कभार ही सामने आ पाती है। इस अंधेरे में गुम होकर बर्बाद होने वाली रचनात्मक और सृजनशील प्रतिभाओं का आंकड़ा शायद ही किसी के पास हो, क्योंकि पराजित और असफल होने वालों का इतिहास नहीं लिखा जाता।

शिंजिनी सेनगुप्ता की करुण कहानी इसलिए हफ्ते भर से लोगों के जेहन में गूंज रही है क्योंकि उसकी त्रासदी में अनेक विडंबनाएं एक साथ दाखिल हो र्गई। कोलकाता की यह सोलह वर्षीय किशोरी एक रियलिटी टीवी शो की नृत्य प्रतिस्पर्धा के आखिरी पड़ाव पर पहुंचकर मंजिल छू पाने में असफल रही और इस असफलता के कारण निर्णायक मंडल से मंच पर ही अपमानित होने के बाद दुख और स्तब्धता के चलते लकवाग्रस्त हो गई।

शिंजिनी बेंगलुरु के मानसिक अस्पताल में अपना इलाज करा रही है। इससे जुड़े बहुत सारे सवाल हैं, जिनका संतोषजनक जवाब खोजा जाना चाहिए। महिला एवं बाल विकास मंत्री इस घटना को बाल अधिकार से जोड़ती हैं और अनियंत्रित बाजारवाद को इसके लिए दोषी ठहराती हैं तो सूचना प्रसारण मंत्री इसे टेलीविजन कार्यक्रमों को सेंसर करने के अवसर और जरूरत के तौर पर देखते हैं।

ये सब बातें कुछ हद तक जायज हो सकती हैं लेकिन असल सवाल तो यह है कि हम तब तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं, जब तक कोई हादसा नहीं हो जाता। हादसों का इंतजार करने और स्थितियों को बिगड़ने देने की जिम्मेदारी कौन लेगा।

टीआरपी के जाल में फंसे टीवी चैनल अपने कार्यक्रमों की रेटिंग बढ़ाने के लिए वह सबकुछ करने को आतुर हैं जिसे सार्वजनिक नैतिकता और माध्यमों की नैतिकता के लिहाज से भी अच्छा नहीं माना जा सकता। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि हम अपने बच्चों को इस निर्मम और अनैतिक प्रतिस्पर्धा का आहार क्यों बनने दे रहे हैं।

हम ऐसा क्यों चाहते हैं कि यदि अपने जीवन में शोहरत, समृद्धि और ग्लैमर से वंचित रह गए तो अपनी इस दमित इच्छा की पूर्ति का बोझ अपने मासूम बच्चों पर डाल दें। बच्चों के सहज, नैसर्गिक और सृजनात्मक विकास का यह सबसे बड़ा रोड़ा है।

यदि हम अपनी हताश उम्मीदों को पूरा करने का साधन अपने बच्चों को बनाने लगेंगे तो उन्हें अपनी उम्मीदों पर खरा उतरने का अवसर कैसे मिलेगा। यह तो उन्हें कुंठित करने और अवसादग्रस्त बनाने का शॉर्टकट फॉमरूला है। इस प्रक्रिया में शिंजिनी सेनगुप्ता जैसी त्रासदियों का होना अपरिहार्य लगता है।





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