अजमेर.
नसीराबाद सैनिक छावनी के बलवंता फायरिंग रेंज से सटे राजोसी गांव में बुधवार सुबह बम ब्लास्ट में परिवार के तीन लोगों की मौत हो गई। हादसे में जख्मी एक किशोर की हालत गंभीर बनी हुई है।
बम धमाके से घटना स्थल से करीब पांच किलोमीटर की परिधि के लोग सिहर उठे। हादसे में हताहत परिवार के बच्चों को जिंदा बम सेना के चांदमारी क्षेत्र में मिट्टी में दबा हुआ मिला था जिसमें से पीतल, जस्ता और अन्य धातु निकालने के लिए सुबह बम को हथौड़े से तोड़ते समय विस्फोट हो गया।
राजोसी गांव में कलालिया का बाड़िया निवासी नाथू पुत्र मोहम्मद झोपड़ी के बाहर आंगन में गुरुवार सुबह ग्रेनेड को हथौड़े से तोड़ रहा था। पास में उसकी तेरह वर्षीय बेटी रफीता, बारह वर्षीय बेटा अमीन और कुनबे के भैरू का पुत्र कालू भी मौजूद थे। सभी बच्चे बम को तोड़ने का मंजर बड़ी उत्सुकता से देख रहे थे। करीब सवा आठ बजे तेज धमाके के साथ बम फट गया।
धमाका और बम की क्षमता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि नाथू, रफीता, अमीन और कालू के शरीर क्षत-विक्षत हो गए। नाथू और रफीता उछल कर पांच फीट दूर गिरे। नाथू का शरीर उछल कर कच्चे मकान की दीवार से टकराया था। नाथू और रफीता की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि अमीन और कालू को जेएलएन अस्पताल पहुंचाया गया, जहां कालू ने दम तोड़ दिया।
घटना से राजोसी, बलवंता और आसपास के गांव के लोग सिहर उठे। बड़ी संख्या में लोग मौके पर जमा हो गए। एएसपी ग्रामीण बहादूर सिंह और नसीराबाद सदर थाना प्रभारी पुलिस दल के साथ मौके पर पहुंच गए। तहसीलदार सुरेश सिंधी, नसीराबाद और बाघसूरी से चिकित्सकों का दल भी मौके पर पहुंच गया। पुलिस ने नाथू और उसकी बेटी रफीता का पोस्टमार्टम मौके पर ही मेडिकल बोर्ड से करवा दिया। पुलिस मामले की जांच कर रही है।
कबाड़ से कहर : प्रारम्भिक तौर पर पुलिस जांच में पता चला है कि बलवंता फायरिंग रेंज से सटे गांव के लोग रेंज में भेड़-बकरियां चराने जाते हैं। बुलेट और बम के टुकड़े बीन कर ले आते हैं। इसमें से पीतल, जस्ता, लोहा और अन्य धातु निकाल कर कबाड़ियों को बेच देते हैं। मृतक नाथू की पुत्री रफीता मंगलवार शाम को बकरियां चराने गई थी, उसे रिफ्यूज ग्रेनेड मिल गया। उसने बम के बारे में पिता नाथू को बताया और झोपड़ी में रख दिया। नाथू और रफीता बुधवार सुबह बम को तोड़कर धातु निकालने की कोशिश कर रहे थे। ब्लास्ट में जान चली गई।
सात गांवों पर मंडराया खतरा
पिछले करीब चार दशक से सेना की चांदमारी के अभ्यास में काम आ रहे बलवंता फायरिंग रेंज के आसपास के सात गांवों में खतरा दिन-ब-दिन बढ़ रहा है। आबादी से सटे फायरिंग रेंज में बिखरे गोला-बारूद से पीतल, तांबा, जस्ता निकालने के फेर में लगभग 50 लोग हादसे का शिकार हो चुके हैें। इनमें से 35 लोगों की मौत हो चुकी है और बाकी लोग अपंग हो चुके हैं।
नसीराबाद सैनिक छावनी की बलवंता फायरिंग रेंज 1965 से शुरू हुई है। सेना के जवानों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग और हथियारों की मारक क्षमता की परख इस फायरिंग रेंज में की जाती है।
मोर्टार, हैंड ग्रेनेड के धमाकों की आवाजें यहां के लोगों के लिए अब रुटीन बन चुकी हैं। रेंज के आसपास बसे गांव ढाणी, राजोसी,हटूंडी,खाजपुरा,दाता, जाटिया और माखुपुरा के लोग भेड़-बकरियां लेकर निषिद्ध इलाकों में चले जाते हैं, जहां गोला-बारुद के बिखरे टुकड़ों को लोग पीतल, तांबा, लोहा और अन्य धातु निकालने के लिए घर ले आते हैं और जिंदा बम, कारतूस और अन्य विस्फोटकों से लोग हादसे का शिकार हो जाते हैं।
पुराने जख्म हरे : राजोसी गांव के बाड़िया कैरी का बेरी के निवासी भंवर पुत्र लाला और उसके परिजनों के चौबीस साल पहले के पुराने जख्म बुधवार को कलालिया के बाड़िए के हादसे से फिर हरे हो गए। भंवर ने ‘भास्कर’ को बताया कि 11 मई 1983 में उसके भाई रहमान की बम ब्लास्ट में मौत हो गई थी। रहमान फायरिंग रेंज में जानवर चराने गया था।
जिंदा बम पर ठोकर लगने से ब्लास्ट हो गया। गांव का ही दिलदार पुत्र ताजु खान भी फायरिंग रेंज में बिखरे गोला-बारूद से पीतल, जस्ता, लोहा निकालते समय विस्फोट में जान गंवा बैठा था। उसका भाई सरदार पुत्र ताजु विस्फोट में पैर गंवा चुका है। हुसैन पुत्र सुम्भा, नूर मोहम्मद पुत्र कम्मा और नैना पुत्र बाबू भी हादसे का शिकार हो चुके हैं। गांव के अब्दुल, भोमा, महावीर और अली के परिजन भी बुधवार के हादसे के बाद सहमे हुए है। यह सभी लोग फायरिंग रेंज के हादसे का शिकार हो चुके हैं।
रेंज हटाने की जरूरत : बलवंता फायरिंग रेंज के आसपास के गांवों के लोगों को रात-दिन यह दहशत रहती है कि कहीं सेना के जवानों की जरा सी चूक से उनके घर पर गोला-बारूद का कहर नहीं बरस जाए। लोग बच्चों को फायरिंग रेंज की तरफ नहीं जाने की हिदायत चौबीसों घंटे देते रहते हैं। गांव के निवासी भूतपूर्व सैनिक अल्लानूर का कहना है कि चालीस दशक पहले बनी बलवंता फायरिंग रेंज मौजूदा स्थिति के लिए उपयुक्त नहीं है।
वर्तमान में अधिक दूरी तक मारक क्षमता के हथियार सेना के पास हैं। कई आधुनिक हथियारों में मारक क्षमता कम्प्यूटराइज्ड फीड होती है। संचालित कर रहे जवानों की जरा सी चूक से पूरा गांव बर्बाद हो सकता है। चालीस साल के दौरान गांव की आबादी भी दुगनी हो गई है। लोगों ने फायरिंग रेंज के नजदीक झोपड़ियां, मकान बना रखे हैं। खेतों में लोग जान हथेली पर रखकर काम करते हैं। राजोसी गांव के निवासी सीआरपीएफ से एक्ससर्विसमैन बहादुर खां का कहना है कि फायरिंग रेंज से गांवों पर खतरा मंडरा रहा है।
सेना की एहतियात पर सवाल : बलवंता फायरिंग रेंज के आसपास के गांव के लोगों ने सेना के अफसरों की सजगता पर भी सवाल उठाए हैं। लोगों का कहना है कि रेंज में फायरिंग शुरू होने से तीन-चार दिन पहले आसपास के गांवों के लोगों को सचेत किया जाना चाहिए। सेना के अफसर यह कार्रवाई सिर्फ कागजों में ही कर रहे हैं।
फायरिंग शुरू होने की सूचना ढाणी, राजोसी, हटूंडी, खाजपुरा, दांता, जाटिया और माखुपुरा गांव के सरपंचों को सेना के मेजर दत्ता की ओर से पत्र के जरिए दी जाती है। गांव के आसपास जवानों को भी लाल झंडे के साथ तैनात किया जाता है। गांव के लोगों ने इस व्यवस्था को पर्याप्त करार नहीं दिया।राजोसी सरपंच रहमत खां और हटूंडी सरपंच शमीना ने सेना की तरफ से पत्र के जरिए सूचना मिलने की पुष्टि की। सरपंचों का कहना है कि मीटिंग में वे लोगों को सचेत करते हैं।
एडीएम को सौंपी जांच : कलेक्टर ने विस्फोट की जांच एडीएम प्रशासन केके शर्मा को सौंपी है। महाजन ने रेंज के नजदीक एक वर्ष में दूसरी बार हुए विस्फोट को गंभीरता से लेते हुए कहा कि जांच में पता लग जाएगा कि फायरिंग रेंज से अनुपयोगी बम कैसे लाया गया। महाजन ने माना कि दोनों बार विस्फोट मगरा क्षेत्र में हुए हैं, यदि यही विस्फोट घनी आबादी क्षेत्र में हुआ होता तो बड़ी जनहानि हो सकती थी। मृतक बच्चों के परिवारजन को मुख्यमंत्री सहायता कोष से दस-दस हजार रुपये तथा घायलों को पांच-पांच हजार की सहायता दी है।