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Chhattisgarh
Raipur Raipur रायपुर.
सावित्री और किशन नागरची की गोदपुत्री आकांक्षा की मौत से लड़ाई बुधवार को मुंबई के एक अस्पताल में थम गई। एंटी न्यूक्लीयर एन्टीबाडी सीरम नाम की बीमारी से जूझ रही आकांक्षा ने तीन दिन कोमा में रहने के बाद कल रात दम तोड़ दिया। दैनिक भास्कर की पहल शहर के लोगों ने उसके इलाज के लिए दिल खोलकर मदद की थी। इसके बाद उसका मुंबई के एक नामी गैरसरकारी अस्पताल में 15 दिन पहले इलाज शुरू हुआ था।
बच्ची का लिवर खराब हो गया था और डाक्टर आखिरी वक्त तक पसोपेश में रहे कि दवाओं से इसे ठीक करें या ट्रांसप्लांटेशन किया जाए। आकांक्षा के पिता किशन के मुताबिक डाक्टरों की सोच थी कि ट्रांसप्लांट करना खतरनाक हो सकता है। दवा से ठीक करने की कोशिश के दौरान तीन दिन पहले बच्ची कोमा में चली गई।
आपरेशन की सबसे बड़ी रुकावट ये थी कि उसे अपनी उम्र की ही बच्ची का ओ-पाजिटिव ग्रुप लिवर चाहिए था। यह भी नहीं मिल पाया। संतानहीन नागरची परिवार ने सात साल पहले इस बच्ची को गोद लिया था। उसके इलाज में नागरची परिवार ने जमा पूंजी झोंक दी। बीमारी गंभीर थी, इसलिए दंपत्ति ने इलाज के लिए लोगों से गुहार लगाई। इसके बाद भास्कर ने मदद का बीड़ा उठाया और बड़ी संख्या में शहर के लोग मदद के लिए आगे आए।
शहर की मन्नत अधूरी : आकांक्षा की मदद को पूरा शहर उमड़ पड़ा था और लोग उसकी जिंदगी के लिए मन्नतें मांग रहे थे। आकांक्षा के मुंबई जाने के बाद भी लोग भास्कर कार्यालय में फोन कर उसका हालचाल पूछते रहे।
ऐसा संभवत: कम ही होता है जब लोगों ने 20 से 50 हजार रु. तक की मदद की और अपना नाम किसी को नहीं बताया। स्कूली बच्चों ने भी अपनी पाकेटमनी से 50 से 100 रुपये तक की मदद की। इस तरह, बच्ची के इलाज के लिए करीब 2 लाख रुपए जुटाए गए थे। यह काम नहीं आए। गुरुवार को देर शाम नागरची दंपत्ति आकांक्षा का शव लेकर रायपुर पहुंच गए।