आलेख.
पिछले महीने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भूटान दौरे पर गए थे। भूटान इस मायने में अनोखा देश है कि वहां विकास का पैमाना प्रति व्यक्ति आय नहीं, बल्कि लोगों के सुख और उनकी खुशियां हैं। प्रधानमंत्री ने जरूर ही यह गौर किया होगा कि वहां लोगों की जिंदगी में कोई हड़बड़ी नहीं है, कोई भाग-दौड़ नहीं है।
ऐसा जान पड़ता है कि वहां लोगों को धीमी गति से विकास, धीरज तथा संतोष में ज्यादा यकीन है। संभव है इसी से मनमोहन सिंह को धर्य की महत्ता का अंदाज हुआ होगा और वे अपने देश के लोगों को महंगाई का सामना धर्य के साथ करने की सलाह दे बैठे। पैसे के पीछे भागने की आधुनिक समाज की सोच में भूटानियों को यकीन नहीं है। वे छलांग लगाकर आगे बढ़ने की जल्दी में नहीं दिखते। शायद उन्हें दिन भर के काम के बाद परिवार के सदस्यों या लोगों के बीच वक्त बिताने से या पास के किसी मठ में ध्यान-चिंतन करने में ही ज्यादा आनंद मिलता है।
आज के जमाने के लोग इन्हें पिछड़ा हुआ कहेंगे मगर यह भूल जाएंगे कि सुबह ९ बजे से रात ९ बजे की नौकरी करते हुए तमाम तरह के अत्याधुनिक साजोसामान से सुसज्जित घर उनके किस काम आता है। वह तो सिर्फ नींद लेने का ठिकाना मात्र है या फिर मेहमानों में अपनी समृद्धि का आतंक पैदा करने के लिए होता है। सो यह भागमभाग तो बेमानी लगती है।
प्रधानमंत्री से आम आदमी और पत्रकार जब बढ़ती हुई महंगाई और मुद्रास्फीति के बारे में सवाल करते हैं तो वे उन्हें अपने भूटान के अनुभव से मिले सबक के अनुसार धर्य रखने की हिदायत देते हैं। आखिर उन्होंने २क्क्४ मंे अपना कार्यकाल शुरू करने से पहले ‘कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ’ का वायदा जो किया था। शायद दौलतमंद लोगों के लिए वक्त ज्यादा मायने नहीं रखता।
इसीलिए प्रधानमंत्री ने कहा कि धीरज रखो, सितंबर तक कीमतें कम हो जाएंगी। फिर, कुछ कम जानकार या नासमझ लोग लाभ कमा रहे व्यवसायियों और कारोबारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की मांग कर रहे थे और चूंकि हाल ही में उन्होंने भूटान में प्रसन्नता का पाठ पढ़ा था, इसलिए उन्होंने कहा कि वे किसी भी सख्त कदम के खिलाफ हैं। एक ही झटके में उन्होंने सबको खुश रखने का मंत्र पा लिया -आम आदमी मुश्किलों के बावजूद धीरज रखे और कारोबारी वर्ग यह जानकर खुश रहे कि उसके खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाया जाएगा।
अगर कोई कहे कि यह तो खुश रखने का एकतरफा तरीका है तो यह सोचना उसकी भूल है। क्या कोई उस दशा में खुश रह सकता है जब उसके मित्र अपने खिलाफ लिए गए सख्त फैसलों के कारण दुखी हों और इस समय कारोबारी ही सरकार के सबसे प्रिय मित्र हैं। देश की खुशी का पैमाना उनकी खुशी से ही मापा जाता है, वे विदेशी कंपनियों को खरीदकर या रहने के लिए 45 मंजिली इमारत बनाकर या पांच करोड़ रुपए की कार खरीदकर कितने खुश हैं।
यदि राष्ट्रीय मीडिया पर भरोसा करें तो हमारे देश में शेयर बाजार में उछाल को खुशी-संपन्नता का पैमाना माना जाता है, मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शेयर बाजार पर देश के 0.1 फीसदी से भी कम लोगों (कारोबारी वर्ग) का नियंत्रण होता है।
आज देश में कारोबारियों की खुशी का पैमाना यह है कि कितनी जल्दी वे अरबपति बन जाते हैं। अरबपति बनने के लिए ढेर सारा मुनाफा कमाने की दरकार है। मुनाफा ज्यादा कमाने का एक और तरीका सरकार से जोड़तोड़ करके रियायतें हासिल करना हो सकता है।
दूसरा तरीका काले धन का है, जिससे करीब पचास प्रतिशत अतिरिक्त जीडीपी उत्पन्न होती है। कहते हैं कई भारतीयों के पास ढेर सारा काला धन है, जिसे लीचेस्टिन जैसे संदिग्ध ठिकानों पर विदेशों में छिपा कर रखा गया है। हाल में जर्मनी ने यह पेशकश की, कि लीचेस्टिन के बैंकों में किस भारतीय का कितना पैसा जमा है, इसके आंकड़े वह मुहैया करा सकता है। लेकिन पीएमओ ने इसे नजरअंदाज कर दिया।
जहां तक ‘आम आदमी’ की बात है, वह धीरज रखकर खुश हो सकता है। उसे सड़क पर उतरने और चीखने-चिल्लाने की जरूरत नहीं है। यानी नए अर्थशास्त्री का प्रसन्नता सूचकांक यह है कि उद्योगपति-व्यापारियों के पास बेइंतहा दौलत हो और बाकी लोग अपना भविष्य संवरने का धीरज के साथ इंतजार करें। क्या वाकई हमारे छोटे पड़ोसी देश भूटान का यही सबक है या फिर यह वॉशिंगटन का सबक है, जिसके साथ एटमी करार के लिए सरकार इतनी बेकरार है।
लेखक जेएनयू में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं।