दृष्टिकोण.
नाकामी के अभिशप्त संबंध को लेकर साहिर लुधियानवी ने लिखा था..
तआरूफ रोग बन जाए, तो उसको भूलना बेहतर,
ताल्लुक बोझ बन जाए, तो उसको तोड़ना अच्छा।
रिश्ता चाहे मुहब्बत का हो या सियासत का, यदि उसे निर्णायक अंजाम तक ले जाना मुमकिन न हो, तो उसे किसी मोड़ पर पहुंचकर छोड़ देना ही ठीक रहता है। कांग्रेस नीत यूपीए और वामपंथी मोर्चे का करीब साढ़े चार वर्षो का सहयोग ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां उनकी राहें जुदा हो जानी चाहिए। समय नजदीक आते चुनावों का है और अफसाना किसी फिल्म का नहीं है, इसलिए अब उसे कोई खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना भी संभव नहीं है।
पिछली लगभग एक शताब्दी के इतिहास से यदि कांग्रेस कोई सबक ले सकती है, तो उसे कम्युनिस्ट मोर्चे से किसी दिलनवाजी की उम्मीद न रखते हुए उनका साथ तत्काल छोड़कर नए हमराही तलाशने चाहिए।
कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों में कभी भी विचार साम्य नहीं रहा। उनका लक्ष्य कभी एक नहीं रहा। सच तो यह है कि वामपंथी सदैव शत्रुता की हद तक कांग्रेस के प्रतिद्वंद्वी रहे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कम्युनिस्टों ने कांग्रेस का विरोध किया। सन् 1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का कम्युनिस्टों ने विरोध करते हुए अंग्रेजों का साथ दिया।
मुसलिम लीग के पृथकतावादी आंदोलन के दौरान उसके प्रति सहानुभूति रखते हुए भारत के विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण की हिमायत की। वामपंथी लेखक और विचारक सदैव महात्मा गांधी के राजनीतिक दर्शन के कटु आलोचक रहे। ई.एम.एस. नंबूदरीपाद की पुस्तक ‘गांधी एक्सरेड,’ जिन्होंने पढ़ी है, वे समझ सकते हैं कि भारतीय कम्युनिस्ट किस प्रकार गांधी और गांधीवाद से घृणा करते रहे हैं।
भारत में पिछले सात-आठ दशकों में यह धारणा पनपाई गई कि पं. जवाहर लाल नेहरू वामपंथी रुझान के राजनेता थे। सच यह है कि पं. नेहरू सोवियत संघ से भले ही प्रभावित थे पर भारत में सार्वजनिक क्षेत्र में भारी उद्योगों की स्थापना एवं विकास के लिए उन्होंने सोवियत संघ से घनिष्ठ संबंध स्थापित करके सहयोग भी लिया। यह भी सच है चीन के प्रति उनकी आसक्ति थी।
परंतु देश की स्वतंत्रता के तत्काल बाद कम्युनिस्टों ने प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू की सरकार को हिंसक क्रांति द्वारा उखाड़ फेंकने का षड्यंत्र रचा था। ठीक छह दशक पूर्व कामरेड बी.टी. रणदिवे ने जनता द्वारा निर्वाचित नेहरू सरकार को सशस्त्र संघर्ष द्वारा उखाड़ फेंकने का आह्वान करते हुए कहा था, ‘वर्तमान सरकार के स्थान पर कामगारों, किसानों और दमित मध्यवर्गो के जनतांत्रिक गणराज्य को प्रतिस्थापित किया जाएगा।’
बेशक 1948 में भारत सरकार बहुत मजबूत नहीं थी। कश्मीर में कबायलियों के भेष में पाकिस्तान के फौजी हमले से वह जूझ रही थी। हैदराबाद में निजाम की अलगाववादी पहल के विरुद्ध भी कठोर कदम उठाने पड़े थे। फिर भी वह उतनी कमजोर नहीं थी, जितनी कामरेड रणदिवे के नेतृत्व में कम्युनिस्टों ने उसे समझ लिया था। नतीजा यह हुआ कि तेलंगाना का कम्युनिस्ट विद्रोह बुरी तरह कुचल दिया गया।
1948-49 में पं. जवाहर लाल नेहरू ने कम्युनिस्टों के इरादों को भांपते हुए एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए थे। पं. नेहरू ने राज्य सरकारों को चेतावनी दी कि वे कम्युनिस्टों की गतिविधियों से सतर्क रहें। राज्य सरकारों को भेजे एक पत्र में पं. नेहरू ने लिखा, ‘भारत के कम्युनिस्टों ने कम्युनिस्ट आंदोलन के दृष्टिकोण के भी विपरीत आचरण करते हुए गलत रास्ता अख्तियार किया है। वे आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं और तोड़फोड़ में लिप्त हैं।’
पं. नेहरू की यह धारणा कोई एकदम नई नहीं थी। सन् 1942 में भी वह लिख चुके थे, ‘कम्युनिज्म यकीनन आदर्शवादियों और अवसरवादियों को एक साथ आकृष्ट करता है, लेकिन जिस ढंग से यह काम करता है उसमें हिंदुस्तान की भलाई का कोई विचार नहीं है और नैतिक मूल्यों की उसमें कोई गुंजाइश ही नहीं है।’
अक्टूबर 1962 में पं. नेहरू के विश्वास को चीन ने किस प्रकार तोड़ा उसे कांग्रेस ने विस्मृत नहीं किया होगा। दुर्भाग्य की बात यह थी कि भारतीय कम्युनिस्टों के एक वर्ग ने चीन का साथ दिया। ईएमएस नम्बूदरीपाद ने उसे चीन का आक्रमण मानने से इंकार करते हुए तर्क दिया था, ‘चीनी उस क्षेत्र में यह सोचकर दाखिल हुए थे कि यह उनका अपना इलाका है। इसलिए उसे आक्रमण करार करने का प्रश्न ही नहीं उठता।’
कांग्रेस सहित उन सभी पार्टियों को जिनकी निष्ठा इस देश की सीमाओं से बाहर नहीं है, उन्हें इस तथ्य को गंभीरता से लेना चाहिए कि देश के लगभग एक तिहाई हिस्से में नक्सलवादियों के नए संस्करण माओवादियों की उपस्थिति हो चुकी है।
महज चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस के अनेक नेता उन माओवादियों से सहयोग लेते रहे हैं और उनकी परोक्ष सहायता भी करते रहे। वे इस तथ्य को कैसे विस्मृत करते हैं कि भाकपा और माकपा दोनों पार्टियों की माओवादियों के साथ सहानुभूति रही है।
मार्क्सवादियों और माओवादियों का लक्ष्य भी एक है- भारत की वर्तमान संविधानिक और सामाजिक व्यवस्था को ध्वस्त करना। उनका यह कोई नया लक्ष्य नहीं है। 1967-68 में जब पश्चिमी बंगाल में कम्युनिस्टों ने लगभग अराजकता की स्थितियां उत्पन्न कर दी थीं, तो वहां के राज्यपाल धर्मवीर ने मार्क्सवादी नेता ज्योति बसु से व्यक्तिगत बातचीत में पूछा था कि आखिर अव्यवस्था और अराजकता उत्पन्न करके उनकी पार्टी क्या हासिल करना चाहती है।
ज्योति बसु का दो टूक उत्तर था, ‘हमारा उद्देश्य है कि वर्तमान संविधान और व्यवस्था को पूर्णतया नष्ट कर देना, ताकि इसके मलवे पर हम अपनी पसंद का संविधान और अपने लक्ष्य के अनुरूप समाज-व्यवस्था निर्मित कर सकें।’
लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।