संपादकीय. अमरनाथ विवाद की प्रतिक्रियास्वरूप पिछले कई दिनों से जम्मू क्षेत्र में मचे कोहराम और इस पर भाजपा के राष्ट्रव्यापी विरोध के साथ सांप्रदायिक अलगाव का खतरा बढ़ता जा रहा है। भारत बंद की सफलता-असफलता का सांख्यिकीय विश्लेषण छोड़ भी दें तो अलगाववाद के बढ़ते रुझान को नजरअंदाज करना कठिन है। जम्मू क्षेत्र पिछले कई दिनों से उबल रहा है।
प्रदर्शनकारियों की मुठभेड़ सुरक्षा बलों से ही नहीं दूसरे समुदायों के स्थानीय निवासियों और आतंकवादियों से भी हो रही है। आतंकवादी प्रदर्शनकारियों पर हैंडग्रेनेड से हमले कर रहे हैं और सांप्रदायिक दंगों की स्थितियां पैदा हो रही हैं। यह नई बात है। कश्मीरी पंडितों के घाटी से पलायन के समय भी स्थानीय स्तर पर सांप्रदायिक तनाव की ऐसी स्थिति नहीं बनी थी।
जम्मू-कश्मीर में हुर्रियत और आतंकवादियों का हिंसक और विद्वेषपूर्ण अभियान कई वर्षो से चल रहा है, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वे स्थानीय आबादी को सांप्रदायिक आधार पर बांटने में विफल रहे। अमरनाथ विवाद पर वहां की मुख्य धारा की राजनीतिक पार्टियों के संकीर्ण रवैये ने आतंकवादियों-अलगाववादियों के मंसूबों को जाने-अनजाने पूरा करने का काम किया है।
जम्मू क्षेत्र के भद्रवाह विधानसभा क्षेत्र में ही आतंकवादियों ने प्रदर्शनकारियों पर हमला किया है। यह राज्य के मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद का चुनावी क्षेत्र है। इससे मुख्यमंत्री के अन्य दावों की भी पोल खुलती है। पिछले चुनावों में पूरे राज्य से भाजपा को महज एक सीट मिली थी, जबकि कांग्रेस को प्राप्त 21 सीटों में से 16 अकेली जम्मू क्षेत्र से मिली थी।
इस बार इस स्थिति को उलटने का राजनीतिक खतरा मोल लेकर भी पता नहीं किस मजबूरी में कांग्रेस अलगाववादियों की तान पर थिरकती रही। लेकिन अमरनाथ और वैष्णो देवी जैसे राष्ट्रीय महत्व के तीर्थ स्थलों से उठने वाले विवादों का असर सिर्फ स्थानीय नहीं हो सकता। इसका प्रभावक्षेत्र पूरा देश होगा, इसका आकलन कर पाने में कांग्रेस असफल रही।
इसलिए भारतीय जनता पार्टी इस विवाद को पूरे देश में पहुंचाने, इस पर कांग्रेस सरकार की नकारात्मक भूमिका को उजागर करने और इस पर चुनावी जनमत संग्रह जैसा करवाने के अभियान में जुट गई है। लेकिन सांप्रदायिक अलगाववाद की जो प्रतिध्वनि अमरनाथ विवाद के बहाने घाटी से उठ रही है वह राज्य और समूचे राष्ट्र के लिए भी एक अपशगुन ही है।