एक बदहवास प्रशासन एक शरीफ शहर को किस तरह से गुंडों के हवाले कर सकता है, इंदौर के ताजा हालात इसकी गवाही पेश करने के लिए काफी हैं। सोलह सालों के बाद इंदौर को एक बार फिर सांप्रदायिकता की आग में धकेल दिया गया है। तब सब कुछ अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद भगवान राम के नाम पर हुआ था। इस बार बाबा अमरनाथ के नाम पर। सरकार का रोल पूरी तरह से गायब है और शहर की निरीह जनता को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है।
कोई जमाना था जब इंदौर की सड़कों को चमड़े की मशकों में पानी भरकर धोया जाता था। आज उन्हीं सड़कों को खून से साफ किया जा रहा है। गलियां पत्थरों से अटी पड़ी हैं। छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियां 1 जुलाई को अपने बस्ते लेकर स्कूलों के दरवाजों पर पहुंचे थे। तीन दिन बाद ही उन्हें मां-बाप कफ्यरू का मतलब समझा रहे थे। सरकार खुश है कि बंद सफल रहा। छह लोगों की मौत और दर्जनों के घायल हो जाने के बाद भी अगर कोई प्रशासन अपने बने रहने के बहाने ढूंढ़ सकता है तो शर्म की हकदार शहर की जनता है, सरकार नहीं।
किसी वक्त अपनी ढेर सारी दूसरी खूबियांे की वजह से पहचाने जाने वाले एक शानदार शहर को दंगों की प्रयोगशाला में बदला जा रहा है। गौर किया जाए कि चुनावों में अभी कुछ महीनों का वक्त बाकी है। इस तरह के और भी हादसों से जनता को गुजरना पड़ सकता है। आतंकवादी हमलों और उनके कारण होने वाले जान-माल के नुकसान के दर्द को मजबूरी के साथ भोगा जा सकता है और उसके लिए सुरक्षा इंतजामों की कमियों को कोसा भी जा सकता है। पर जो धार्मिक आतंकवाद शहर की ही कोख से पैदा हो रहा है उससे होने वाली तबाही के लिए किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
खौफनाक मंजर है कि जिस शहर की तंग गलियों में अंधेरी रात भी बेखौफ गुजर जाने में डर नहीं लगता था उसी इंदौर की सड़कों पर दिन के उजाले में भी दहशत के पहरेदार बैठा दिए गए हैं। सड़कें चौड़ी हो रही हैं और दिल संकरे। जिस जनता को आज कफ्यरू के साए में घरों के भीतर कैद कर दिया गया है उसके ही हाथों में कुछ महीनों बाद चुनावी पर्चियां थमाई जाने वाली हैं। पर सारे राजनीतिक दल जानते हैं कि ऐसे हर हादसे के बाद इंदौर शहर अपने पैरों पर खड़ा हो जाता है और बड़ी से बड़ी मौत को भी भुला देता है। निश्चित ही इस बार भी ऐसा ही होगा।
याददाश्त में केवल बना रह जाएगा कि सरकार अगर समझदार होती और प्रशासन मुस्तैद होता तो जो कुछ हुआ उसे टाला जा सकता था। पर पुरानी यादों में बसे एक खूबसूरत इंदौर के नाम पर ही सही जो कुछ चल रहा है अब उसे बंद हो जाना चाहिए। नन्हे-नन्हे बच्चे अपने बस्ते और टिफिन सजाए हुए स्कूलों की नई कक्षाओं में लौटने को बेताब हो रहे हैं। उन्हें कतई निराश नहीं किया जाना चाहिए।
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