Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे.
सोद्देश्य ‘लगान’ और सामाजिक दस्तावेजनुमा फिल्म ‘तारे जमीं पर’ के बाद निर्माता आमिर खान ने अपने भांजे इमरान खान को प्रस्तुत करने के उद्देश्य से विशुद्ध मनोरंजन गढ़ा है ‘जाने तू..या जाने ना।’ आज की अनौपचारिक पीढ़ी के मस्ती मंत्र को केंद्र में रखकर निर्देशक अब्बास टायरवाला ने इस सहज-सरल प्रेमकहानी में युवा पीढ़ी की अदा और जबान का भी भरपूर इस्तेमाल किया है।
नायक-नायिका को बिल्ली पुकारता है और उसे रेट्स अर्थात चूहों की तरह पुकारा जाता है। इन चूहे और बिल्ली के बीच बैर का नहीं प्रेम का रिश्ता है। फिल्मकार की आधुनिकता ही घिसी हुई कहानी में भी ताजगी पैदा करती है। परंतु यही आधुनिकता परिवारों के प्रस्तुतीकरण में अत्यंत महानगरीय लगती है। एक युवा लड़की के माता-पिता सारे समय शराबनोशी और लड़ाई में बिताते हैं। नायक की मां भी पारंपरिक निरूपाराय या रीमा लागू नहीं है और कई रिश्ते दोस्ताना हैं। पूरी फिल्म ही कॉलेज के दोस्ताने के इर्द-गिर्द घूमती है।
अजीज मिर्जा की फिल्म ‘चलते-चलते’ की तरह इसमें भी दोस्तों की बातचीत के माध्यम से पूरी कथा कही गई है और वे कमोबेश सूत्रधार बन जाते हैं। दोस्तों में प्यार उजागर नहीं हो पाता और इसी को उजागर करने की यह मजेदार कथा है। फिल्म के प्रस्तुतीकरण में ‘जब वी मैट’ की तरह की ताजगी है और युवा पीढ़ी की यह मनभावन बात है। युवा इमरान सहज और स्वाभाविक है परंतु नायिका डीसिल्वा असाधारण प्रतिभा है और पांचवें दशक की गीताबाली की तरह मनभावन काम करती है। फिल्म में रत्ना पाठक के साथ उनके पति नसीरुद्दीन शाह भी हैं और दोनों की नोंकझोंक के दृश्य गुदगुदी करते हैं।
फिल्म में अरबाज खान और सोहेल के थोड़े से दृश्य हैं परंतु उन्हीं दृश्यों से कथा में मजेदार मोड़ आते हैं। दोनों ने अद्भुत हास्य पैदा किया है। अनौपचारिक युवा पीढ़ी के सोच-विचार में एक गौर श्रद्धा का तत्व है जिसे अपमान का भाव नहीं कहा जा सकता, परंतु यह महानता को बहुत कैजुअल ढंग से लेने का भाव है। यही बात फिल्म की केंद्रीय शक्ति है। आमिर खान ने फिर साबित कर दिया कि वह दूसरों से अलग है।