HomeVichaar Vichaar

कलयुग में देशव्यापी ‘बंद’ कथा की महिमा अपार

आलेख. bandh कई राजनीतिक और सामाजिक संगठन जब-तब भारत बंद, रेल रोको आंदोलन, चक्काजाम आदि कराते रहते हैं। आम जनता के बीच ऐसे क्रियाकलापों को लेकर प्राय: अच्छी धारणा नहीं पाई जाती है।

इसकी वजह सरकारी तंत्र का वह दुष्प्रचार है कि बंद और चक्काजाम जैसे लोकतांत्रिक क्रियाकलापों के चलते धन-जन की हानि होती है। वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। बंद जैसे आयोजनों से राजकीय संपत्ति के अनुरक्षण में पर्याप्त सहायता मिलती है। बंद के तमाम खुले लाभ हैं, जो तत्काल प्राप्त होते हैं।

पहला और प्रत्यक्ष लाभ तो यही है कि लोग अपने घरों से नहीं निकलते। इस तरह वे कम से कम एक दिन अपने घर वालों के साथ रहते हैं। होल फैमिली आनंदित होती है। बंद की वजह से बस, ट्रेन, सार्वजनिक वाहन नहीं चलते। लोग डर के मारे अपनी गाड़ियां घर में ही रखते हैं। इस तरह उस दिन करोड़ों रुपयों के डीजल-पेट्रोल की बचत होती है।

सच कहा जाए तो बंद से जहां तेल संकट से निपटने में सरकारों को सहयोग मिलता है, वहीं आयात के मोर्चे पर देश की मुद्रा भी बचती है। तेल की मार से हलाकान यूपीए सरकार को स्वयं बंद और चक्काजाम को प्रोत्साहित करने की पहल करनी चाहिए। यदि संभव हो तो राजकीय स्तर पर इन बंद के आयोजनों को अनिवार्य किया जाना चाहिए।

‘तेल की बूंद बचाओ’ जैसे नारे की जगह रोड साइड होर्डिग्स लगवाकर उन पर बंद समर्थक लोकलुभावन स्लोगन लिखवाए जाने चाहिए। जनता के दिलों से बंद के प्रति घृणा भाव को मिटाकर इसे रोजमर्रा की जरूरतों में सम्मिलित करने की पहल करना हरेक लोकप्रिय सरकार का दायित्व होना चाहिए। गली-गली में बंद की महत्ता पर सेमिनार, संगोष्ठियां होनी चाहिए।

बंद के लाभ ही लाभ हैं। यह आज के लाइफस्टाइल की अनिवार्य आवश्यकता है। इसके होने से वायु प्रदूषण और शोर प्रदूषण का स्तर घटाने में सहयोग मिलता है। हालांकि बंद के विरोधी और दुष्प्रचार करने वाले यह कह सकते हैं कि टायर जलाने से वायु प्रदूषण और बंद समर्थकों की नारेबाजी से ध्वनि प्रदूषण होता है। तथापि ऐसी बातों पर कान न ही देना उचित होगा। हजारों गैलन तेल की खपत और करोड़ों लोगों के शोरगुल के सामने यह नक्कारखाने में तूती की आवाज के समान है।

बंद के विरोधी तो यह भी चिल्ला सकते हैं कि इस दौरान बसें और गाड़ियां फूंक दी जाती हैं। अरे भाई, आप सालों-साल तेल फूंकते हैं, आपको अफसोस नहीं होता। एक-दो सरकारी बसों को फूंके जाने पर हाय-तौबा मचाने की क्या जरूरत है? यूं भी ये सरकारी बसें कौन सा न्यू मॉडल की होती हैं।

इन खटारा और कबाड़ा गाड़ियों के डिस्पोजल में बंद के योगदान को रेखांकित किया जाना चाहिए। गार्बेज और वेस्ट मैटीरियल मैनेजमेंट के विशेषज्ञों को आभारी होना चाहिए। जिनके एक एलान से जगह-जगह आगजनी होती है। कूड़े के ढेर राख में बदल जाते हैं। इस तरह न हर्र लगे, न फिटकरी, साफ सफाई की एक बड़ी प्रॉब्लम का समाधान हासिल हो जाता है।

सरकार ही नहीं एनजीओज को भी चाहिए कि वे ‘ऑल इंडिया बंद फेस्ट’ और चक्काजामोत्सव’ सरीखे भव्य आयोजनों में अपनी रुचि प्रदर्शित करें। शिक्षा विभाग के लिए अपने व्यावहारिक विज्ञान के पाठ्यक्रम में इसकी उपयोगिता और महत्ता पर एक सचित्र अध्याय का समावेश सार्थक होगा। आखिरकार नई पीढ़ी को संस्कारशील बनाने की जिम्मेदारी इसी विभाग की कही जाती है।

आपको क्या पता कि बंद के आयोजन से जनता को कितनी राहत पहुंचती है? समाज के एक बड़े तबके को इससे काम मिलता है। युवा वर्ग में सामूहिकता की भावना आती है। बच्चों की शालाओं में छुट्टियां होने से वे खुश होते हैं। लोग बंद से एक दिन पहले रोजमर्रा की जरूरत की चीजें बटोरने लगते हैं। ज्यादा बिक्री की वजह से दुकानदारों का मुनाफा होता है।

यातायात साधनों के अभाव में दूर के किसी रिश्तेदार के आने की संभावना शून्य हो जाती है। बंद से स्थानीय राजनीतिक वर्कर्स को अस्थाई रोजगार हासिल होता है। पोटेंशिएलिटी की परख होती है। बड़े लीडरान के कैरियर में उछाल आता है। मीडिया को मशक्कत का मौका मिलता है। पुलिस की हाथों की खुजली मिटती है। असामाजिक तत्वों को अपने हुनर के प्रदर्शन का मौका मिलता है।

इस बंद के असंख्य लाभ हैं। मैंने इस मसले पर इधर-उधर की पब्लिक से भी बात कर रखी है। जनता की आकांक्षा है कि इस बंद का आयोजन प्रतिदिन न सही, तो सप्ताह में कम से कम एक दिन अवश्य किया जाना चाहिए। जनाकांक्षा का आदर करना सरकार और समाज की प्राथमिकता होनी चाहिए।

लेखक वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: