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परमाणु सौदे पर दो कौड़ी की राजनीति

दृष्टिकोण.deal कांग्रेस, सपा और वामपंथियों के बीच जो आंख-मिचौली आजकल चल रही है, उसने भारतीय राजनीति को निवर्सन कर दिया है। जनता हमारे नेताओं और दलों का घिनौना रूप खुलकर देख रही है। विचारधारा, सिद्धांत, निष्ठा, शिष्टता जैसे मूल्य कचरे की टोकरी में चले गए हैं। अपने-अपने स्वार्थ और अहंकार के पोषण को राष्ट्रहित का चोला पहनाया जा रहा है।

परमाणु सौदे को राष्ट्रहित की कसौटी बताकर कांग्रेस अपने पांव पर कुल्हाड़ी चला रही है। उसे पता है कि विदेश नीति का यह उलझा हुआ प्रश्न चुनावी मुद्दा नहीं बन सकता। कांग्रेस पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को ही नहीं पता कि प्रधानमंत्री उनकी पार्टी को सूली पर लटकाने को क्यों आमादा हैं? इस मुद्दे पर यदि वे चुनाव लड़ेंगे तो जनता को क्या समझाएंगे?

वामपंथियों को झटक देने और सपाइयों को लपक लेने का खतरा आखिर मनमोहन सिंह क्यों मोल ले रहे हैं? बड़े मियां तो बड़े मियां छोटे मियां सुभानअल्लाह! अभी सपाइयों ने टेका देना शुरू भी नहीं किया है और चोटी खींचना शुरू कर दी है। चिदंबरम को हटाओ! देवड़ा को हटाओ! रिजर्व बैंक के गवर्नर को हटाओ! यह तो वे खुलेआम कह रहे हैं।

जो नहीं कह रहे हैं, वह यह है कि सुप्रीम कोर्ट में हमें मुकदमा जितवाओ, सीबीआई के चंगुल से छुड़वाओ, मायावती को सबक सिखाओ, केबिनेट में हमारे मंत्री घुसाओ! इतनी कीमत तो वामपंथियों ने भी कभी नहीं मांगी। सच्चाई तो यह है कि अब वे छोटी सौदेबाजी से निपटने के लिए बड़ी सौदेबाजी में उलझ रहे हैं।

परमाणु सौदे के नफे-नुकसान का मूल्यांकन करने वाले निष्पक्ष लोग पहले यह मानकर चल रहे थे कि अर्थशास्त्र के प्रोफेसर को विदेश नीति और ऊर्जा की गहरी समझ नहीं है, इसीलिए यह गलती हो रही है लेकिन अब उनका मानना है कि डॉ. मनमोहन सिंह की ओढ़ी हुई विनम्रता में अहंकार का विस्फोट हो गया है। आखिर प्रधानमंत्री हैं, कितने दिन तक दबकर चलते रहेंगे? अब तक जो मनमोहन थे, अब सिंह बन गए हैं।

यदि सौदा रहेगा तो मनमोहन सिंह रहेंगे। बुश अपना बिस्तर गोल करें, उसके पहले ही सौदा करना होगा। कितने गर्व की बात है कि अमेरिकी राष्ट्रपति को बचाने के लिए भारत के प्रधानमंत्री ने अपनी इज्जत दांव पर लगा दी है। हमारी कांग्रेस दुविधा में फंस गई है। ऐन किनारे पहुंचकर अब घोड़ा कैसे बदला जाए? इसीलिए कांग्रेस का रवैया यह है कि जो होगा, सो होगा।

इस आत्महत्या की खूबसूरती यह है कि कुछ नए मरजीवड़े पैदा हो गए हैं। वे साथ में मरने को तैयार हैं लेकिन वे कह रहे हैं कि हम प्रमाण-पत्र पहले ही ले आते हैं। डॉ. अब्दुल कलाम से लिखा लाए हैं और अब कुछ और विशेषज्ञों की तलाश कर रहे हैं। उनसे कोई पूछे कि तुम पिछले तीन साल से क्या कर रहे थे? परमाणु सौदे का विरोध और ईरान का समर्थन क्या खुमारी में कर रहे थे?

अपने चेलों को अजीबो-गरीब गुलाटियां खाते देख डॉ. लोहिया स्वर्ग में अपना माथा ठोक रहे होंेगे। शायद इसीलिए कांग्रेस के सामने निवर्सन होने के पहले सपाइयों ने झीना सा पर्दा तान लिया है। यह पर्दा है, राष्ट्रहित का और धर्मनिरपेक्षता का! कम्युनिस्ट और ‘कम्युनलिस्ट’ (भाजपाई) फिलहाल एक तंबू के नीचे हैं और कांग्रेसी और उनके जन्मजात विरोधी ‘समाजवादी’ दूसरे तंबू के नीचे हैं। अरे भाई, उस तीसरे तंबू का क्या हुआ, जिसे जयललिता और मुलायम सिंह खड़ा कर रहे थे? मार्क्‍सवादी अब अकेले ही कांग्रेस और भाजपा को कोसते रहेंगे। वे तीसरा मोर्चा नहीं, तीसरे दर्जे का मोर्चा बन जाएंगे।

भुस में आग लगाकर मायावती अलग खड़ी हुई हैं। उन्होंने मुसलमानों को उचका दिया है। परमाणु सौदे से मुसलमानों का क्या लेना-देना? विदेश नीति के मुद्दों का सांप्रदायिकरण घोर निंदनीय कृत्य है लेकिन भोले मुसलमानों को पहले भी कई दलों ने निचोड़ा है। मायावती के इस पैंतरे की काट कलाम के कलमे से नहीं हो सकती। भाजपा के नियुक्त किए हुए राष्ट्रपति कलाम को मुसलमानों ने अपना नेता कब माना था? जैसे नौकरशाह मनमोहन, वैसे नौकरशाह कलाम!

दोनों बहुत सज्जन, दोनों बहुत आदरणीय लेकिन उनके राजनीतिक अभिमत की कीमत क्या है? कांग्रेस और सपा अगर अभी साथ-साथ तैरेंगे तो वे साथ-साथ ही डूबेंगे भी! सपा के लिए एक चोर-गली जरूर है। वह कह दे कि हम भाजपा और सौदे, दोनों का विरोध करते हैं लेकिन अधबीच में सरकार गिराने का भी उतना ही विरोध करते हैं।

उत्तर प्रदेश के चुनाव में कांग्रेस और सपा का गठबंधन फायदेमंद हो सकता है और शायद अब इन दोनों दलों के पास कोई और विकल्प भी नहीं है लेकिन असम, आंध्र, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और झारखंड के स्थानीय दलांे की कांग्रेस के साथ सीधी टक्कर है। अगर मुलायम सिंह अपना रास्ता पकड़ेंगे तो ये दूसरे दल क्या चुप बैठे रहेंगे?

दूसरे शब्दों में, धन्य हैं, मनमोहनजी का परमाणु सौदा। इसके कारण कम से कम राष्ट्रीय राजनीति का ध्रुवीकरण तो शुरू हो गया है। इस सौदे की मेहरबानी से जनता को यह भी पता चल रहा है कि विचारधारा और सिद्धांत की बात करना कितना बड़ा ढोंग है। जिन सांप्रदायिक तत्वों को हमारे कॉमरेड और सपाई आज अछूत बता रहे हैं, उनके साथ वे 1967, 1977 और 1989 में हम-प्याला और हम-निवाला रह चुके हैं।

कांग्रेस और कॉमरेडों के बीच स्तालिन-युग में और कांग्रेस और समाजवादियों के बीच लोहिया युग में जो जूतम-पैजार हुई है, उसे अगर आज याद किया जाए तो हमारी नई पीढ़ी उस पर विश्वास नहीं करेगी। भारतीय राजनीति पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति का यह सिद्धांत लागू हो रहा है कि कोई देश किसी देश का न स्थायी मित्र होता है न स्थायी शत्रु। राजनीति के व्यापार में भी स्वर्ग-नरक का विचार क्या करना? सभी नेता यमदूतों को कह रहे हैं कि उधर ही ले चलो, जिधर दो कौड़ी का फायदा हो! दो कौड़ी का फायदा और राष्ट्रहित एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं।

इस राजनीति का नतीजा है कि हमारा कोई भी नेता महंगाई पर ध्यान नहीं दे रहा। उन्हें वे 80 करोड़ लोग दिखाई ही नहीं पड़ रहे हैं जो 20 रुपए रोज पर गुजारा कर रहे हैं। किसी भी नेता ने देश के नाम कोई ऐसा आह्वान नहीं किया कि 100 करोड़ लोग इस भारत-भूमि में एक बड़े परिवार की अनुभूति करें। एक नकली सौदे ने सौ करोड़ के देश पर दो कौड़ी की राजनीति को लाद दिया है।

लेखक वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं।





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Awadhesh singh
Sunday, 6th Jul 2008, 2:26
kya varisthata me sab yogyata aati ha, anubhav aata hai ya fir keval aayu. kya yeh samanti vyavastha thik hai ki aap pathakon ko kuchha padhane ke liye vivash kijiye