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शह-मात के खेल से अवाक जनता

संपादकीय. हमारे राजनेताओं ने अपने पराक्रम से राजनीति को कला और मनोरंजन के सबसे ऊपरी सोपान पर पहुंचा दिया है। टेलीविजन को अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए किसी सोप-ओपेरा की शरण में जाने की जरूरत नहीं है। समसामयिक राजनीति की दुनिया इतने रहस्य-रोमांच से भरी हुई है कि उसे देखकर हताशा और अवसाद में फंसी हुई जनता के होठों पर भी एकबारगी मुस्कराहट तैर जाती है। हमारी आज की राजनीति अपने लिए रोज नए-नए व्यावहारिक प्रतिमान गढ़ रही है और ऐसे-ऐसे अनूठे प्रयोग कर रही है, जिसे सिर्फ अवाक होकर देखा ही जा सकता है।

जो लोग विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच मौजूद गहरे अंतर्विरोधों को वास्तविक मानते हुए लालू प्रसाद के इस कथन कि सरकार भी चलेगी और परमाणु डील भी होगी, को हास्यास्पद मानते थे, उन्हें अब इस हास्य में छिपे राजनीतिक यथार्थ पर गौर करना चाहिए। कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी के सिद्धांत पर बने तीसरे मोर्चे के मंच यूएनपीए ने एक झटके में पूरा परिदृश्य बदल दिया।

माना जाता था कि इस मोर्चे में इकट्ठे हुए लगभग सभी दल भाजपा से भी ज्यादा कांग्रेस के विरोधी हैं। इसकी वजह शायद यह थी कि मोर्चे में शामिल पार्टियों को अपने-अपने क्षेत्रों में कांग्रेस से ही सीधा मुकाबला करना होता है। लेकिन सोनिया गांधी से लेकर मुलायम-अमर सिंह जैसे ‘सच्चे समाजवादियों’ ने सत्ता के लिए कटुता भरे अतीत को भुलाते हुए वामपंथियों को भी चकित कर दिया।

अगर केरल, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में कांग्रेस के विरुद्ध चुनाव लड़कर भी वामपंथी केंद्र में कांग्रेस की सरकार को समर्थन दे सकते हैं, तो मुलायम-अमर सिंह को भी ऐसा अवसरवादी प्रयोग करने से कौन रोक सकता है। भाजपा की बढ़ती हुई शक्ति का भय और अमरनाथ के मुद्दे पर छेड़े गए राष्ट्रव्यापी अभियान ने तमाम गैर-राजग दलों को यह मौका और बहाना दिया है कि वे अपनी अवसरवादी राजनीति का औचित्य स्थापित करने में जुट जाएं।

सांप्रदायिकता-विरोध का जिरह-बख्तर पहन लेने के बाद सारे पाप अपने आप खत्म हो जाते हैं। परमाणु डील, महंगाई और किसानों की आत्महत्या जैसे मुद्दे पानी भरते नजर आते हैं। इन दलों को भाजपा का आभारी होना चाहिए कि उसके अस्तित्व और सामथ्र्य से इनको भी राजनीतिक ऑक्सीजन मिलती रहती है और इनकी प्रासंगिकता व चमक बनी रहती है, लेकिन भाजपा के होने की गुनाह की सजा इन दलों के रूप में सारे देश को भुगतनी पड़ती है।





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