भोपाल. जवाहर लाल नेहरू कैंसर हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के डॉक्टर्स की टीम ने हाल में ही एक जटिल और जोखिम भरा ऑपरेशन किया है। जिसमें एक आदमी का पैर बचा लिया गया। ऑस्टियो सारकोमा (हड्डी के कैंसर) के इस सफल ऑपरेशन में लगभग 1 लाख 20 हजार रुपए का खर्च आया।
सिरौंज के रहने वाले 40 वर्षीय नवल सिंह को एक साल से पैर में दर्द के कारण चलने-फिरने में दिक्कत हो रही थी, जिसकी वजह से वह कामकाज करने में भी असमर्थ था, लेकिन नवल सिंह खुशकिस्मत साबित हुआ कि एक साल के भीतर ही उसके परिवार वाले उसे जवाहरलाल नेहरू कैंसर हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में जांच के लिए ले आए।
सर्जिकल आंकोलॉजिस्ट डॉ. अतुल समैया ने उसकी जांच की तो मालूम चला कि उसकी जांघ के नीचे के हिस्से की हड्डी में कैंसर हो गया था। डॉ. अतुल समैया ने बताया कि इस स्थिति में उनके पास दो ऑप्शन थे या तो उसका पैर काट दिया जाए या फिर ऑपरेशन का जोखिम उठाया जाए।
साथ ही डर इस बात का था कि कहीं कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में न फैल चुका हो। इसके लिए मरीज का सीटी स्कैन, एमआरआई और एक्सरे आदि जांचें की गईं। अच्छी बात यह रही कि कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में नहीं फैला था।
मद्रास से बनकर आया कृत्रिम जोड़
परिवार वालों की सहमति से ऑपरेशन को हरी झंडी मिल गई। डॉ. समैया का साथ दिया जाने-माने अस्थि रोग विशेषज्ञ डॉ. उमेश बत्रा ने। डॉ. बत्रा ने निर्णय लिया कि मरीज की कैंसर ग्रस्त हड्डी को निकाल कृत्रिम जोड़ सहित हड्डी लगाई जाए।
इसके लिए निकाली जाने वाली हड्डी का एक्सरे रिपोर्ट के मुताबिक नाप लिया गया और मद्रास की ईगल ऑस्टियो कंपनी को कृत्रिम जोड़ तैयार करने के लिए नाप भेजा गया। पन्द्रह दिन बाद एलॉय से बना कृत्रिम जोड़ बनकर आ गया। इसे बनवाने में लगभग 40 हजार रुपए का खर्चा आया।
सबसे बड़ी चुनौती
डॉक्टर्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि खून की नसों और उसकी विशेष शाखाओं को ट्यूमर के पास से अलग करना था क्योंकि अगर खून की कोई भी नस कटती तो मरीज का पैर काला पड़ सकता था और उसके पैर की ताकत हमेशा के लिए जा सकती थी। दूसरी चुनौती थी कि सर्जरी के दौरान मसल्स का कटना तय था, डॉक्टर्स ने मसल्स को कटने के बाद पुन: जोड़ने का काम भी किया।
डॉ. अतुल कहते हैं ऐसा न करने पर मरीज के पैर का मूवमेंट भी हमेशा के लिए खत्म हो जाता। यह सर्जरी 5 घंटे चली, जिसमें डॉ. नीलू मेहरोत्रा, डॉ. रेणु राय, डॉ. अभिषेक शर्मा तथा डॉ. आदिल हसन ने सहयोग दिया। एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉ. लता भट्टाचार्य ने दिया। डॉ. अतुल समैया ने बताया कि अब मरीज को कीमोथैरेपी दी जाएगी।
ऑपरेशन के बाद ली राहत की सांस
नवल सिंह खुद अपने पैरों पर चलकर आया और ऑपरेशन के पहले की स्थिति बयां की। उसने कहा कि खर्चा बहुत ज्यादा था लेकिन अस्पताल के डॉक्टर्स ने काफी हद तक व्यक्तिगत रूप से आर्थिक मदद करते हुए उसका इलाज किया।
नवल ने कहा कि दिन-रात पैर कटने का डर सताता रहता था लेकिन ऑपरेशन के पन्द्रह दिन बाद उसका दर्द बंद हो गया है और अब वो आराम से चल पा रहा है। हालांकि नवल को कीमोथेरेपी से डर लग रहा है, लेकिन डॉक्टर के कहने पर वह राजी हो गया है।