विशेष संपादकीय. राजधानी हैरान है कि उसके रखवालों को लाज क्यों नहीं आती? कड़क खाकी का रुतबा सिर्फ शरीफ नागरिकों पर बचा है- अपराधी तो कभी का उसे रौंद चुके हैं। शनिवार को स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर की शाखा में डकैती के दौरान लुटेरों ने वास्तव में बैंककर्मियों व लोगों को नहीं, वरन् राजस्थान पुलिस की हिम्मत को ही स्ट्रांग रूम में बंद कर दिया। स्पष्ट है, ऐसे कमजोर पुलिस तंत्र की वजह से ही आम आदमी अब गुंडों का सॉफ्ट टारगेट बन गया है। सबसे बड़ा खतरा क्या?
इस डकैती के कारणों में जाने से परतें उघड़ेंगी और एक के बाद एक खामियां उजागर होती चली जाएंगी, लेकिन सबसे ज्यादा सतर्क रहना होगा उस खतरे को लेकर जो इस वारदात में उभरकर सामने आया है। यह है बोतल से पेट्रोल छिड़ककर, लाइटर से आग लगाने का जघन्य तरीका। यानी लुटेरों को किसी तरह का कोई डर नहीं।
न किसी को व्यर्थ जिंदा जला देने का डर, न ही ऐसा करते समय खुद जलकर खाक हो जाने का। ऐसे में पुलिस के आने या पकड़े जाने का खौफ तो ख़ैर दूर-दूर तक नहीं ही होगा। तो हम सब के लिए अब यह सबसे बड़ा ख़तरा होगा कि समाज विरोधी तत्व आग का सामान लेकर खुलेआम घूमेंगे और पुलिस, थानों में मुंह छिपाती फिरेगी।
कैसे रुकेगा ये सिलसिला?
सूने मकानों पर धावे, हाथ-पैर बांधकर परिवारों को लूटने की वारदातों के बाद जौहरी बाजार बैंक डकैती ने समूचे शहर को हिलाकर रख दिया था, लेकिन पुलिस के चेहरे पर शिकन तक न आई। इस सरकार को कभी इस बात के लिए याद नहीं किया जाएगा कि उसने कभी किसी अफसर पर सख़्त और तत्काल कार्रवाई की हो।
फिर गुर्जर आंदोलन की पहली परीक्षा में बुरी तरह विफल रहे पुलिस बल की अकर्मण्यता को और बल तब मिला जब भयावह आतंकी विस्फोटों को जयपुर जहर के घूंट की तरह पी गया- और अफसरों से आशा करता रहा कि वे कुछ करेंगे। सरकार की ओर देखता रहा कि चार-छह न सिर्फ हटाए जाएंगे, बल्कि सÊा भी पाएंगे।
राजनीतिक कारणों से छुटपुट कुछ किया हो तो याद नहीं, किंतु इस सरकार को अधिकारियों की उद्देश्यहीन प्रश्रयदाता के रूप में खासी ख्याति मिल चुकी है, इसलिए जो कुछ करना हो- हमें अपने ही स्तर पर, एकजुट होकर करना होगा। जान-माल को बचाने के कड़े उपाय करने होंगे। रहवासी क्षेत्रों में निजी सुरक्षाकर्मियों से लेकर आक्रामक श्वानों तक के प्रबंध करने होंगे। पुलिस के भरोसे पर भारी-भरकम गेट आए दिन बड़ी-बड़ी कॉलोनियों में इसीलिए लगाए जा रहे हैं।
सबसे अधिक निर्लज्ज कौन?
खुफिया तंत्र चलाने वाले अफसर। सिवाय राजनीतिक सूचनाएं इकठ्ठी करने के- किसी तरह का कोई काम नहीं कर रहे इंटेलीजेंस या ऐसे ही नामों से जाने जाने वाले विभागों/एजेंसियों के कर्ता-धर्ता। ये अपना सारा समय गुप्त, निजी, अप्रासंगिक या ऐसी सूचनाएं- जिनका राज्य हित से कोई लेना-देना नहीं है- जुटाने में व्यर्थ कर रहे हैं।
किसी समय जब कानून की सेवा में प्रवेश कर रहे थे- इन सभी का जज़्बा राष्ट्रभक्ति का था। आज सत्ता की राजनीति में अपनी समूची प्रतिभा को उलझाए बैठे हैं। हालत इतनी खराब है कि अपने पदों के साथ मिलने वाले विशेषाधिकारों का दुरुपयोग भी वे ढंग से नहीं कर पा रहे हैं- उसमें तक गलतियां हो रही हैं।
सत्ता पक्ष के असंतुष्टों, प्रतिपक्ष के संतुष्टों और मीडिया के ‘दुष्टों’ की आवाजाही पर निगाहें रखना, उनकी बातचीत पर कान और टेप लगाना और उनके मिलने-जुलने वालों को सूंघना ही उनका सुबह से रात तक का काम बचा है।
जब तक गुप्तचर शाखाएं चुस्त-दुरुस्त नहीं होंगी, जब तक मन में अपराधियों को थर-थर कंपा देने का संकल्प लेने वाले अफसर-जवान सही पदों पर तैनात नहीं किए जाएंगे, जब तक राजनीति की जी-हुजूरी करने वाले बने रहेंगे, जब तक प्रमुख मैदानी जिम्मेदारियां जोशीले-जांबाज अफसरों को ढूंढ़-ढूंढ कर नहीं दी जाएंगी, जयपुर लुटता ही रहेगा।
हमें कभी भी, कोई भी, किसी भी वक्त अपमानित कर जाएगा। कोई एक- सिर्फ एक ऐसे पुलिस अफसर की तलाश है- जिसके इरादे ही अपराधियों की रूह कंपाने को काफी हों। सिर्फ एक प्रखर राष्ट्रवादी। नहीं तो हिम्मत तो खूब है पुलिस में- लेकिन स्ट्रांग रूम में बंद ही रहेगी।