अमृतसर.
बंटवारा हुआ तो सीमाएं बंटीं, दिल बंटे, लेकिन एक चीज न बंट सकी, वह है चौधरी मौलाबख्श की इंसानियत। मौला तो मौला उनके बेटे चौधरी रहमत अली गुज्जर ने पिता की इंसानी विरासत को न केवल संजोए रखा, बल्कि उससे भी दो कदम आगे निकल गए।
बंटवारे के 61 साल बाद भी उन्होंने उन 57 मकानों को उसी तरह सहेज रखा है, जैसा हिंदुओं ने उन्हें सौंपा था। अब वे वच्छूवाली मंदिर का फिर से निर्माण कराने के लिए प्रयासरत हैं, जिन्हें धर्र्माधों ने गिरा दिया है।
अचानक हुई मुलाकात जून में पाकिस्तान गए शोधकर्ता सुरेंद्र कोछड़ ने बताया कि मार्च 2006 में वच्छूवाली मंदिर गिराने के बाद उसे बचाने के लिए संघर्ष करने वाले चौधरी रहमत का नाम चर्चा में आने पर वह मिलने के लिए बेताब थे।15 दिन पहले जब वह पाक गए तो उनकी मुलाकात शेर अली से हुई, जो उन्हें अपने घर ले गए, जहां उन्होंने अपने पिता चौधरी रहमत अली से उनका परिचय कराया, तो वह चौंक गए।
अचानक वह उनसे मिले, जिन्हें वह कई सालों से तलाश रहे थे। कोछड़ ने बताया चौधरी रहमत की हवेली और उनके आसपास के घर की चीजें और भी चौकाने वाली थीं। चौधरी ने उन घरों को दिखाया जो बंटवारे के समय हिंदू उनके पिता चौधरी मौलाबख्श (मौली) को सौंप गए थे।
उसमें सामान और भगवान की मूर्तियां तक सुरक्षित थीं। समय के थपेड़ों ने उन्हें कुछ पुराना और जीर्ण जरूर कर दिया मगर, उसे सहेजने में चौधरी ने अपनी तरफ से कोई कोशिश नहीं छोड़ी।
पुजारी के धर्म-पुत्र थे चौधरी मौला
चौधरी मौला बख्श की दूध कीडेयरी थी। हिंदुओं के घरों में दूध बेचकर वह सरमाएदार हो गए। वच्छूवालीमंदिर के पुजारी ने चौधरी मौली को अपना धर्म पुत्र बना लिया था। जब बंटवारा हुआ तो चौधरी मौली ने अपनी निगरानी में हिंदुओं को भारत पहुंचाया। यहां से जाते हुए 57 हिंदू परिवारों ने उन्हें लिखकर दे दिया कि ये घर, जमीन-जायदाद चौधरी को बेच दिया है, ताकि पाक सरकार या कोई उस पर कब्जा न कर लें।
सारा वच्छूवाली हिंदुओं से खाली हो गया, लेकिन पिता मोह में फंसे मौली ने पुजारी को नहीं जाने दिया और एक महीने तक अपने घर में छिपाकर रखा। माहौल बिगड़ता चला गया और एक रात अंधेरे में चौधरी ने पुजारी को भारत पहुंचाया। जाते-जाते पुजारी ने वादा लिया कि वह मंदिर को कुछ नहीं होने देंगे। बाद में आवाम ने शिकायत कि चौधरी मौली ने हिंदुओं को बंदूक की जोर पर भारत पहुंचाया और मंदिर की रखवाली कर रहे हैं।
सरकार ने उन्हें दस्ता बदमाश घोषित कर जेल भेज दिया, जहां अत्याचार सहते हुए उनकी मौत हो गई। इससे पहले जब चौधरी रहमत उनसे मिले तो उन्होंने वादा लिया कि मंदिर को कुछ नहीं होने देना। चौधरी रहमत ने कहा एक रात उनके सपने में मां शेरां वाली आई और कहा कि मेरे हाथ में एक कबूतर है बोलो क्या करूं। उन्होंने झट से फरियाद की कि मां साहिब इसको आपका स्पर्श मिल गया है, ये मुझे दे दें।
इस पर मां ने कहा कि ये कबूतर तेरे घर औलाद बनकर आएगा। चौधरी ने ये सपना अपनी पत्नी को सुनाया तो उन्होंने कहा कि डॉक्टर ने स्पष्ट कर दिया है कि शेर अली और अवैस अली के बाद उन्हें कोई औलाद नहीं हो सकती, पर चौधरी का विश्वास जीत गया और उनकी तीसरी औलाद हुई, जिसका नाम रखा गुलाम अली और बाद में गुलाम अली को यही शिक्षा दी गई कि उसे ताउम्र मां की गुलामी करनी है। इन्होंने घर में मां साहिब का स्थान बनाया है। हर महीने सात ज्योतें जगाते हैं, 7 चुनरियां लाकर चढ़ाते हैं और पूड़ी हलवे का प्रसाद बांटते हैं।