नई दिल्ली. भारतीय थल सेना अब ‘अजरुन’ टैंक का और ऑर्डर नहीं देगी। करीब 30 साल से ‘अजरुन’ देश का मुख्य युद्धक टैंक (एमबीटी) रहा है, लेकिन सेना का कहना है कि अब उसे भावी पीढ़ी के अत्याधुनिक टैंकों की जरूरत है और ‘अजरुन’ उसकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता।
सेना की मैकेनाइज्ड इन्फेंट्री के महानिदेशक ले. जन. दलीप भारद्वाज ने कहा कि आवडी स्थित हैवी वहिकल्स फैक्ट्री को 124 टैंक खरीदने का ऑर्डर दिया जा चुका है और भविष्य में इस टैंक की खरीद नहीं होगी।
सेना बीस साल आगे की प्लानिंग कर रही है और उसे ‘भविष्य का टैंक’ चाहिए। यहां भारतीय उद्योग परिसंघ के कार्यक्रम में भाग लेने आए भारद्वाज का कहना था कि इसका मतलब 1972 में शुरू हुए डीआरडीओ के ‘अजरुन’ प्रोजेक्ट का खत्म होना नहीं है। अजरुन सामयिक टैंक है और अगले दस साल तक यह अपनी सेवाएं दे सकता है।
परीक्षण में हो गए थे फेल
डिजाइन और विकास पर 36 वर्र्षो की रिसर्च के बाद बनाए गए अजरुन टैंक दिसंबर 2007 में सेना के परीक्षण में फेल हो गए थे।
सेना का सेमिनार 22 से
सेना सीआईआई के साथ मिलकर 22-23 जुलाई को एक इंटरनेशनल सेमिनार करवा रही है। इसमें भविष्य के मुख्य युद्धक टैंक (एमबीटी) पर चर्चा होगी। सेमिनार का उद्घाटन रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी करेंगे।