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अब है मौसम झमाझम बारिश का

ज्योतिष विज्ञान.rain भारत एक कृषि प्रधान देश है। इस देश में वृष्टि का पूर्वानुमान कम से कम 6 मास पूर्व किया जाए तो सर्वाधिक उचित एवं कृषि के अनुकूल होगा। मई-जून के आधार पर कह सकते हैं कि इस वर्ष वर्षा अच्छी होगी। कुछ जगहों को छोड़कर वर्षा के परिणाम अच्छे होने की संभावना है।

जीवन को जीने के लिए सर्वाधिक आवश्यकता यदि किसी वस्तु की है, तो वह है वायु और जल। इन दो पदार्थो के बिना जीवन की कल्पना व्यर्थ है। इन दोनों के ही सामंजस्य का नाम वृष्टि है। इस आधार पर कह सकते हैं कि वृष्टि जीवन का मूल आधार है। कहा भी है,
वृष्टि मूला कृषि: सर्वा वृष्टिमूलं च जीवनम्।
तस्मादादौ प्रयत्नेन वृष्टिज्ञानं समाचरेत्॥

सर्वप्रथम मानव ने वृष्टि के कार्य और कारण भाव को जानने का प्रयास किया तो पाया कि पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश ही विशेष रूप में विचारणीय बिंदु हैं। आज का मौसम विज्ञान प्रथम दृष्टया इन्हीं बिंदुओं का विचार करता है। वृष्टि के निमित्त इन पांच तत्वों को प्रभावित करने वाले तत्व इन्हीं के आसपास रहते हैं।

इस प्रकार का विचार करते हुए सर्वाधिक जोर ऋषियों ने आकाश पर दिया। क्योंकि त्रिकालज्ञ ऋषि अपने निरंतर चिंतन से यह समझ गए थे कि ये तत्व ब्रrांड में स्थित नक्षत्र, तारों, ग्रहों आदि से प्रभावित होते हैं। आज भी साक्ष्य के रूप में वह प्रचुर साहित्य विद्यमान है, परंतु उपेक्षित पड़ा हुआ है। आज आवश्यकता है पुन: उस विधि का परिशोधन कर प्रतिष्ठित करने की।

भारत एक कृषि प्रधान देश है। इस देश में वृष्टि का पूर्वानुमान कम से कम 6 मास पूर्व किया जाए तो सर्वाधिक उचित एवं कृषि के अनुकूल होगा। हमारे वैदिक एवं वैदिकोत्तर साहित्य में वृष्टि के विस्तृत तथ्य मूलक वैज्ञानिक परिणाम उपलब्ध होते थे।

महर्षि पाराशर, आचार्य वराहमिहिर आदि आचार्यो ने कृषि और वृष्टि दोनों के वैज्ञानिक पक्षों पर विशेष बल दिया है। ऋषियों ने कृषि के लिए वृष्टि की आवश्यकता को समझते हुए उसके पूर्वानुमान के संदर्भ में अनेक पक्ष प्रस्तुत करते हुए वृष्टि के परीक्षण की बात कही है। यथा,
अन्नं जगत: प्राणा: प्रावृट चान्नमायक्षम्।
यस्मादत: परीक्ष्य: प्रावृटकाल प्रयत्नेन॥

भारतीय ज्योतिर्विज्ञान की तीन शाखाएं हैं जिनमें सभी प्रकार के पूर्वानुमानों का वर्णन है। प्रकृति के पूर्वानुमानों का विचार ज्योतिष शास्त्र संहिता स्कंध के द्वारा करता है। इस स्कंध पर इस समय सर्वाल्प दृष्टि से विचार किया जाता है जो कि सिद्धांत पक्ष की दृष्टि से उचित नहीं है। वर्षभर में व वर्षाऋतु में कब वर्षा होगी, कितनी होगी या नहीं होगी आदि का ज्ञान हमें वर्षपति, वर्ष के अन्य प्रभावी ग्रहों एवं आयन, मास, पक्ष, दिन, नक्षत्र आदि के द्वारा ही होता है।

इस वर्ष के संवत्सर का नाम प्लव है। इस संवत्सर का फल है कि संपूर्ण पृथ्वी जल से आप्लावित (परिपूर्ण) रहेगी। आधि एवं व्याधियों की अधिक संभावना रहेगी। यथा प्लवाब्दे निखिला धात्ती वृष्टिभि: प्लवसन्निभा। इस वर्ष का राजा ग्रह चंद्र है। चंद्र का फल वर्षा के संदर्भ में है कि पर्याप्त मात्रा में वर्षा होने के कारण अन्न एवं वनस्पति की स्थिति अच्छी होगी। यथा चंद्रे नृपे मंगल शोभनानि प्रचुरा वृष्टि: प्रचुरं च धान्यम्। इस वर्ष का अधिपति बुध है।

अत: इसका फल है कि मेघ अधिक वर्षा करेंगे यथा - लधरा जलराशिभुचो भृशम्। इस वर्ष का धान्येश चंद्र है। चंद्र के धान्येश होने पर अच्छा धान्य होगा। इसलिए अच्छी वर्षा होगी तभी धान्य भी अच्छा होगा। यथा चन्द्रे धान्याधिपे जाते तोम पूर्वा वसुन्धरा। इस वर्ष का मेघेश शनि है। यह अभी तक के अधिकारी ग्रहों में वृष्टि के संदर्भ में एकमात्र क्रूर ग्रह है। इसलिए इनका फल भी बहुत अच्छा नहीं है। शनि मेघेश होने पर विरल वृष्टि होती है अर्थात कहीं अधिक और कहीं कम वर्षा होगी। यथा रविसुते जलदस्य पतौ भवेद्विरलवृष्टि वती वसुधातलम्।

वर्ष नाम आषाढ़ है, फल है कहीं विपन्नता कहीं संपन्नता व जल भी कहीं कहीं। यथा व्यचिदीति: क्वचिद्भीति: क्वचित्वृद्धिर्जलं क्वचित्॥ इस वर्ष मेष का नाम आवर्त है। आवर्त का फल छिन्नवृष्टि कहा गया है अर्थात कहीं-कहीं सूखा पड़ता है। यथा आवर्ते छिन्नवृष्टि: स्यात्। रोहिणीवास संधि में है अत: खंडवृष्टि का योग बनता है। यथा खंडवृष्टिश्च संधिषु। समय का निवास वणिक गृह में है अत: महंगाई अपार होगी यथा - वणिग्रहे शुभ नास्ति।

वर्षा का विचार चंद्र में सूर्य का आद्र्रा नक्षत्र प्रवेश काल भी विशेष महत्व रखता है। इस वर्ष (संवत २क्६५) आद्र्रा के सूर्य का प्रवेश 21 जून २क्क्८ आषाढ़ कृष्ण तृतीया शनिवार को रात्रि 21.45 बजे हुआ है। इससे ऐन्द्रयोग भी है। इसका फल कहा गया है कि कुछ प्रांतों में भारी सूखा, दुर्भिक्ष आदि से किसानों को कष्टप्रद वातावरण में रहना पड़ सकता है। परंतु साथ ही यह भी कहा गया है कि यदि रात्रि में आद्र्रा प्रवेश करते हैं तो अच्छी वर्षा एवं कृषि होती है। यथा - जगत्क्षेम करो रात्रो बहुसस्यजलप्रद:। विशेषकर शनिवार को आद्र्रा प्रवेश शुभ नहीं कहा गया है।

इसलिए यह कहा गया है कि वर्षा कम हो सकती है जबकि उस दिन उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में चंद्र है। अत: आद्र्रा विचार से वर्षा प्राय: अच्छी होगी। बहुत कम स्थानों पर विरल वर्षा के संकेत हैं। अत: शास्त्रानुसार यह कह सकते हैं कि महाराष्ट्र, गुजरात, उड़ीसा, बिहार आदि पूर्व एवं पश्चिम के प्रांतों में भारी वर्षा से जनहानि एवं कृषि की क्षति हो सकती है। दक्षिणी प्रांत कुछ मात्रा में सूखाग्रस्त हो सकते हैं। 21 जून से 8 अगस्त तक शनि-मंगल का सिंह राशिस्थ रहना वर्षा से कृषि एवं धन-जन हानि होने का संकेत है। इस वर्ष विशेषकर मई-जून में वर्षा अच्छी हुई।

शास्त्रों में कहा गया है कि शुक्रास्त एवं उदय से भी वर्षा का विचार करना किया गया है, परंतु शुक्र के उदयास्त पर अधिक ध्यान दिया गया है। इस वर्ष दिल्ली के अक्षांश पर शुक्र का अस्त होना 5 मई की रात्रि पूर्व में देखा गया। शुक्र अश्विनी नक्षत्र में चल रहा था। इस दिन अमावस्या भी थी। कहा गया है कि कृष्ण पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी और अमावस्या को यदि शुक्रास्त एवं उदय दोनों में से कोई भी हो तो यह सुवृष्टिकारक होता है। यथा
शुक्रस्यास्तोदयौ शुक्ले वृष्टियोगाय चक्षते।
कृष्णोùष्टम्यां चतुदेश्याममायां च सुवृष्टये॥

इस वर्ष शुक्र के अस्त होने के दिन अमावस्या थी। अश्विनी नक्षत्र शुक्र के नक्षत्र विभाजन की दृष्टि से छठे मकल में पड़ता है। साथ ही यह कनकद्वार का नक्षत्र कहा गया है। दोनों का फल वृष्टि के संदर्भ में शुभ कहा गया है। शुक्रोदय दिल्ली में 13 जुलाई को दिन में 13.46 बजे होगा। इस समय शुक्र पुष्य नक्षत्र में होगा। पुष्य नक्षत्र मेघद्वार एवं द्वितीय मकल का नक्षत्र है। द्वितीय मकल एवं मेघद्वार में शुक्र के उदय का फल सुवृष्टि कारक कहा गया है। यथा
मेघ द्वारद्वये मेघा वर्षन्ति प्रचुरं वय:।

उपयुक्त समस्त वर्णन से यह कहा जा सकता है कि इस वर्ष वर्षा अच्छी होगी। मात्र कुछ जगहों को छोड़कर वर्षा के परिणाम अच्छे होने की संभावना है। ज्योतिष शास्त्र के द्वारा वर्षा का विचार करना भी बहुत सहज नहीं है। इस विषय में यदि पूर्ण ध्यान दिया जाए तो बहुत चमत्कारी परिणाम मिल सकते हैं।





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