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वह शाम कुछ अजीब थी

परदे के पीछे.आमिर खान के ताऊ नासिर हुसैन ने अपने बेटे मंसूर के निर्देशन में आमिर को अवसर दिया था ‘कयामत से कयामत तक’ में और फिल्मांकन के दौरान ही आमिर को रीना दत्त से प्यार हो गया था। उस फिल्म के गीत ‘पापा कहते हैं..’ में रीना की झलक भी देखने को मिलती है। उन दिनों मंसूर की बहन इन युवा लोगों की केंद्रीय शक्ति थी। इन सबको मनमोहन देसाई की शशी कपूर अभिनीत ‘आ गले लग जा’ का गीत ‘जाने तू या जाने ना’ बहुत पसंद था। ‘कयामत’ की सफलता ने आमिर को सितारा बना दिया, उसने रीना से शादी कर ली।

कोई दो दशक बाद मंसूर की बहन के लड़के इमरान को बतौर शुकराने के प्रस्तुत करने का नैतिक दायित्व आमिर ने बखूबी उठाया और निर्माण के समय मंसूर खान को भी स्वयं के ओढ़े हुए वनवास से आमिर वापस लेकर आए। इतना ही नहीं उन्होंने मंसूर खान को बतौर निर्माता भी प्रस्तुत किया है। नई फिल्म के प्रथम प्रदर्शन पर उसने अपनी पत्नी रीना को भी आमंत्रित किया क्योंकि इस दास्तान के प्रारंभ से ही पंद्रह वर्ष तक वे इस दल की महत्वपूर्ण सदस्य रहीं। शुकराना पूरी तरह से अदा किया जाना था। उनकी वर्तमान पत्नी किरण ने भी रीना का गर्मजोशी से स्वागत किया। यह यादों की जुगाली का वक्त था। यह शाम भी कुछ अजीब थी।

जब आमिर ने आशुतोष की पटकथा ‘लगान’ पर फिल्म बनाने का निर्णय किया तब उनकी तत्कालीन पत्नी रीना ने निर्माण में गहरी जवाबदारी के साथ सारे काम किए और फिल्म के वेशभूषा विभाग में किरण बतौर सहायक काम कर रही थीं। कार्यकारी निर्माता रीना ने किरण को मेहनताना भी अदा किया होगा जैसे वे पूरी टीम को करती थीं। ऊपर वाले की पटकथा कितनी अजीब होती है। वर्तमान क्षण में हमें आगे आने वाले समय की कल्पना नहीं होती। हर लम्हे के गर्भ में जाने क्या छिपा होता है, जाने कोई जाने ना। इसलिए हमें हर क्षण, हर लम्हे को पूरी शिद्दत से महसूस करना चाहिए। हमारे अनजाने ही कितने क्षण हमारी अंगुलियों से छिटक जाते हैं।

आमिर खान द्वारा निर्मित पहली दोनों फिल्में ‘लगान’ और ‘तारे जमीं पर’ संजीदा सार्थक फिल्में थीं और तीसरी में उन्होंने फामरूले को आदरांजलि दी है। इस फिल्म को बनाते वक्त उनके जेहन में ताऊ नासिर हुसैन की फामरूला फिल्में जरूर आई होंगी। उन्हें मसाला मनोरंजन से कोई एतराज नहीं है, परंतु नए के प्रति विशेष रुझान है और हिंदुस्तानी सिनेमा की विचार प्रणाली कुछ ऐसी ही है।





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naved
Monday, 7th Jul 2008, 11:38
आदाब आपकी लेखनी के कद्रदानों की फेहरिस्त हालांकि बहुत लम्बी है, पर उन्हीं में एक अदना सा मेरा नाम भी शरीक हैं, इसे क्या कहूं की आपसे कई बार राब्ता करना चाहा पर वहीं हो पाया जैसा इस लेख का सवाल है यह वाकई एक गहराई लिए हुए है........