बीकानेर. बीकानेर स्थित देश के एक मात्र राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र (एनआरसीसी) की तर्ज पर अब सऊदी अरब भी ऊंटों पर आधारित एक रिसर्च सेंटर खोलने की तैयारी कर रहा है। फिलहाल इस केन्द्र का नाम ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन कैमल’ दिया गया है।
सऊदी अरब की किंग साउद यूनिवर्सिटी ये सेंटर खोलेगी। सऊदी अरब में खोले जा रहे इस सेंटर में सबसे बड़ा योगदान एनआरसीसी का होगा। वहां खुलने वाले सेंटर का रूप क्या होगा और कि न-किन आधारों को लेकर सेंटर पर काम होगा, यह एनआरसीसी तय करेगा। इस कार्य से अब एनआरसीसी की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बन गई है। इसी मकसद से सऊदी अरब से एक हाईपावर कमेटी सात जुलाई को बीकानेर पहुंचेगी जो सेंटर पर ऊंट आधारित अनुसंधान व अन्य उपलब्ध तकनीकों का अध्ययन करेगी।
कमेटी में किंग साउद यूनिवर्सिटी के प्रो. सईद बस्माइल व डॉ. अब्दुल अलोमेर शामिल हैं। ऊंटपालन के क्षेत्र में यहां की कौन सी तकनीक का सऊदी अरब में उपयोग किया जा सकता है, इसको भी चिन्हित किया जाएगा। एनआरसीसी से भी एक प्रतिनिधि मंडल वहां के वैज्ञानिकों से बातचीत करेगा। ऊंटपालन में सहयोग करने के लिए कुछ टिप्स देगा।
जब दोनों देशों के वैज्ञानिक इस मसौदे पर पूर्ण रूप से सहमत होंगे तब अंत में जाकर दोनों देशों के बीच एमओयू होगा। एमओयू होने के बाद सऊदी अरब की तकनीक का उपयोग भारत में भी किया जा सकेगा। इसके लिए यहां से एक वैज्ञानिकों का दल वहां जाएगा जो वहां खुलने वाले नए सेंटर को स्थापित करने में सहयोग करेगा।
गौरतलब है कि ऊंटपालन के क्षेत्र में भारत के बाद सऊदी अरब का स्थान है। वहां की जलवायु भी लगभग भारत से मिलती-जुलती है। रेतीला इलाका होने के कारण वहां एक कूबड़ वाले ऊंट ही अधिक पाए जाते हैं। जलवायु व तापमान में विशेष अंतर नहीं होने के कारण ही यहां की तकनीक वहां कारगर साबित हो सकती है।
कम उम्र में प्रजनन कराने की तैयारी : सऊदी अरब से एनआरसीसी का एमओयू होने के बाद कई बिंदुओं पर अनुसंधान भी किया जाएगा लेकिन सबसे अधिक ध्यान ऊंटों में प्रजनन की उम्र पर अधिक ध्यान दिया जाएगा। फिलहाल ऊंटनी छह साल बाद गर्भधारण करने योग्य होती है लेकिन वैज्ञानिक चार साल में ऊंटनी के गर्भधारण कराने पर अनुसंधान कर रहे हैं क्योंकि ऊंटपालकों को छह साल तक ऊंटनी को पालना मुश्किल हो रहा है। इसके अलावा दूध की गुणवत्ता पर भी अनुसंधान किया जाएगा।
सऊदी अरब से हाइपावर कमेटी सात जुलाई को यहां पहुंचेगी। उसके बाद दोनों देशों के वैज्ञानिकों से बात होगी। सब कुछ ठीकठाक रहा तो एमओयू होगा। यहां के वैज्ञानिक सऊदी अरब में संस्थान स्थापित कराने में मदद करेंगे। इसके बाद मिलजुलकर अनुसंधान भी होगा।
-डॉ.के.एम.एल.पाठक, निदेशक, एनआरसीसी