उदयपुर. युद्ध दुश्मनी निकालने का साधन नहीं है। किसी भी देश को अपना डिफेंस सिस्टम इसलिए मजबूत बनाना चाहिए ताकि वह उसकी आर्थिक प्रगति में सहायक बनें। प्राकृतिक आपदा के समय रक्षा महकमा लोगों की जान बचाएं, रोग नियंत्रण में सहायक बने।
एमबीटी (मैन बैटल टैंक) ‘अर्जुन’, गन सिस्टम ‘भीम’ सहित मिसाइल आकाश, अग्नि व नाग आदि के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले देश के प्रमुख रक्षा विशेषज्ञ एम. नटराजन का रक्षा और युद्ध को लेकर कुछ ऐसा ही नजरिया है।
रविवार को उदयपुर आए नटराजन से ‘दैनिक भास्कर’ ने जब बात की तो एक रक्षा वैज्ञानिक का आध्यत्मिक स्वरूप उजागर हुआ। स्वयं उन्होंने माना कि वे वैज्ञानिक की बजाय आध्यात्मिक व्यक्ति के तौर पर पहचान पसंद करते हैं। करीब 40 सालों से डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) में सेवारत नटराजन सुबह व शाम को नियमित एक घंटा ध्यान करते हैं।
विज्ञान और आध्यात्म के संगम से मानव कल्याण व देशहित उनका लक्ष्य है। नटराजन कहते हैं डिफेंस का मकसद आत्मरक्षा और सकारात्मक कार्य होना चाहिए न कि शक्ति प्राप्त करके ऑफेंस यानी अपराध करना। एक चाकू से सब्जियां काटकर आप स्वादिष्ट व्यंजन बना सकते हो और उसी चाकू से आप किसी का गला काट सकते हो।
वैज्ञानिकों के लिए अनिवार्य किया योग : नटराजन ने बताया कि डीआरडीओ में वैज्ञानिकों के लिए छह महीने योग प्रशिक्षण अनिवार्य है। सैन्य बलों के लिए योग प्रारंभ किया गया है। विकट परिस्थितियों में काम से थके जवानों का तनाव मिटाने व भावनात्मक समस्याओं के नियंत्रण में यह कारगार तकनीक है। मिल्रिटी व्हीकल टेक्नॉलोजी में दक्ष नटराजन डीआरडीओ के अनुसंधान को आर्थिक व सामाजिक सरोकारों से जोड़ने के पक्षधर हैं।
इसके लिए डीआरडीओ कई राज्यों में विश्वविद्यालयों व वैज्ञानिक संस्थाओं की साझेदारी में काम कर रहा है। इस कड़ी में राजस्थान में जोधपुर में मरूस्थल को हरा भरा करने, सौर ऊर्जा के उपयोग पर प्रोजेक्ट चल रहे हैं।
डीआरडीओ ने प्लेग, एंथ्रेक्स, मलेरिया, चिकनगुनिया जैसी जानलेवा बीमारियों के डायग्नोस्टिक किट बनाए हैं। 2050 में डिफेंस का परिदृश्य कैसा होगा, इस सवाल पर श्री नटराजन का जवाब था कि शायद तब डिफेंस की जरूरत ही न पड़े। कोई ज्योतिष अगर बता दे कि अमुक साल में युद्ध होगा तो निश्चित रूप से रक्षा का स्वरूप तय किया जाएगा।