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पंथ-निरपेक्षता को सुदृढ़ करें

दृष्टिकोण. हिंदुओं के लिए अमरनाथ यात्रा का लगभग वही स्थान है जो कुंभ मेले के समय गंगा, संगम, गोदावरी और क्षिप्रा नदी में स्नान का है। अर्थात हिंदू धार्मिक भावनाओं में अमरनाथ यात्रा का प्रचंड महत्व है। परंपरागत रूप से इस यात्रा का प्रबंध जम्मू-कश्मीर सरकार करती चली आई है। चाहे महाराजा का शासन रहा हो अथवा वर्तमान लोकतांत्रिक शासन।

आतंकी हमलों के बावजूद अब तक इस यात्रा को सांप्रदायिकता से ऊपर रखा गया है और यात्रियों की सेवा अधिकांशत: कश्मीरी मुसलमान ही करते आए हैं। जब तक यात्रा का प्रबंध सरकार के हाथ में था तब तक शिकायत नहीं थी पर जब से तत्कालीन राज्यपाल जनरल एसके सिन्हा ने इसका अलग से प्रबंध मंडल बनाया और यात्रा की बागडोर संभाली तब से इस यात्रा को एक विशिष्ट हिंदू जामा पहनाया गया है।

भारत में अनेक ऐसे धार्मिक प्रसंग हैं जिनमें हमारी मिली-जुली संस्कृति के आधार पर हिंदू-मुसलमान सहर्ष भागीदारी देते हैं। दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया का उर्स, अजमेर में ख्वाजा मुईनउद्दीन चिश्ती का उर्स और अमरनाथ यात्रा इस मिली-जुली संस्कृति के तीन सशक्त उदाहरण हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि मूलत: भारत एक अत्यंत ही धार्मिक परंतु पंथ निरपेक्ष देश है और यहां हिंदू व मुस्लिम कट्टरवाद का कोई स्थान नहीं है।

कट्टरवाद तब पैदा होता है जब धर्म को राजनैतिक जामा पहनाया जाए और इसका राजनीतिक लाभ लेने का प्रयत्न किया जाए। अमरनाथ यात्रा के लिए वन भूमि प्रबंध मंडल को हस्तांतरित करना, इसका कश्मीर घाटी में मुसलमानों द्वारा हिंसक और सांप्रदायिक विरोध करना, फिर सरकार का इस हिंसा के सामने झुकना, जिसकी प्रतिक्रिया जम्मू में हिंसा द्वारा हुई, यह सब प्रतीक हैं कि यदि हम अपनी राजनीतिक आकांक्षाएं सांप्रदायिकता के आधार पर पूरी करनी चाहेंगे तो इसका परिणाम अत्यंत ही अप्रिय होगा।

इलाहबाद, हरिद्वार, उज्जैन व नासिक में हर 12 वर्ष में आयोजित होने वाले कुंभ मेले में निजी भूमि अस्थाई रूप से मेला अवधि में अर्जित की जाती है और भू-स्वामियों को इसकी क्षतिपूर्ति दी जाती है। वहां सरकार द्वारा सारी सुविधा युक्त पंडाल तीर्थ यात्रियों के लिए लगाए जाते हैं। परंतु यह भूमि न तो मेला समिति को स्थाई रूप से हस्तांतरित होती है और न ही शासन द्वारा स्थाई रूप से अर्जित की जाती है। अमरनाथ यात्रा के लिए भी इस प्रकार का प्रबंध क्यों नहीं हो सकता?

इस संदर्भ में भारत और पाकिस्तान की तुलना करना उचित रहेगा। पाकिस्तान मजहब के आधार पर सृजित हुआ और सन् 1956 में उसे इस्लामी जम्हूरियत घोषित किया गया। सन् 1947 में भारत ने अपने आपको पंथ निरपेक्ष घोषित किया और यही प्रावधान हमारे संविधान में है।

पाकिस्तान में प्राय: एक ही मजहब के अनुयायी रहते हैं एवं जो थोड़े-बहुत अल्पसंख्यक हैं उनका दर्जा मुसलमानों से कम है। क्या इससे पाकिस्तान में शांति कायम हुई? इस्लाम के ही दो फिकरे शिया और सुन्नी, एक-दूसरे से झगड़ रहे हैं। इस इस्लामी गणतंत्र में वह सब हुआ है जो भारत में खराब से खराब सांप्रदायिक दंगों में नहीं हुआ। अर्थात शियाओं को उनकी मस्जिद में और सुन्नियों को उनकी मस्जिद में नमाज पढ़ते हुए मारा गया। पठान कबीले पाकिस्तान की फौज से जूझ रहे हैं।

बलूची और पंजाबी एक-दूसरे से लड़ रहे हैं। पाकिस्तान में हर चंद प्रयत्न किया जा रहा है कि उसकी भाषा उर्दू का अरबीकरण किया जाए। वहां की संस्कृति जिसकी जड़ें वही हैं जो भारत की संस्कृति की हैं, को पश्चिम एशिया की ओर धकेला जाए। इसके कारण संस्कृति, कला, संगीत, नाटक एवं नृत्य के मामले में पाकिस्तान एक तरह का रेगिस्तान बन गया है।

इसके विपरीत हमारे भारत में विविधता का सबसे अधिक महत्व है। यदि भारत सबसे बड़ा हिंदू देश है तो साथ में वह विश्व का दूसरे नंबर का इस्लामी देश भी है। सन् 52 ईसवीं में फिलीस्तीन के बाद सबसे पहले ईसाई भारत आए। सिक्ख, बौद्ध और जैन धर्म, जिनकी आधारशिला सनातन धर्म में है, का जन्म भारत में हुआ।

कला का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जिसमें भारत ने कीर्तिमान स्थापित न किया हो। हमारे यहां सांप्रदायिकता समय-समय पर भड़कती है परंतु क्योंकि हमारी परंपरा, हमारा संविधान, हमारी शासन व्यवस्था, हमारी जन मानसिकता पंथ निरपेक्ष है इसलिए सांप्रदायिकता का पागलपन शीघ्र ही काबू में आ जाता है।

यदि हम चाहते हैं कि भिन्नता हो तो सर्वप्रथम तो हमें भिन्नता का संरक्षण करना होगा। ऐसा करने के लिए अतिवाद, आतंकवाद, सांप्रदायिकता और मजहबी कट्टरपन को हमें परे रखना पड़ेगा और पंथ निरपेक्षता का सुदृढ़ करना होगा। परंतु इसके बहुत से दुश्मन हैं जो केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं है। हिंदू कट्टरपंथ इस्लामी कट्टरपंथ से कम खतरनाक नहीं है।

हमें याद रखना होगा कि हमारा धर्म तो सनातन है, जो वार्तालाप, प्रश्नोत्तर, शंका और संदेह की छूट देता है एवं उसके समाधान के लिए वार्तालाप को प्रोत्साहित करता है। सनातन धर्म में मनुष्य को छूट है कि वह नारायण को स्वीकार करे या न करे, उसकी पूजा करे या न करे, उस तक पहुंचने का रास्ता अपने आप ही खोज ले एवं ऐसा करते समय किसी का बहिष्कार न करे। यही सच्ची पंथ निरपेक्षता है। इसमें सांप्रदायिकता का क्या स्थान है?

भारत के सबसे बड़े दुश्मन वाह्य देश नहीं हैं। हमारी सेनाओं में इतनी ताकत है कि वे हमारी सीमाओं की रक्षा कर सकती हैं। यदि भारत को कोई खतरा है तो वह आंतरिक है, जिसमें सबसे बड़ा खतरा सांप्रदायिकता है क्योंकि यह एक भारतीय को दूसरे भारतीय से लड़ाती है।

इस संबंध में दारूल उलूम, देवबंद एवं जमात-उल-उलेमा-ए-हिंद की वह पहल स्वागत योग्य है कि आतंकवाद का विरोध हो, मुस्लिम समाज में जो बुराइयां आ गई हैं उनको दूर किया जाए, शिक्षा का सम्मान हो और भाईचारा बढ़े। लाल कृष्ण आडवाणी की समाज के हर तबके की सहमति से राम मंदिर निर्माण की बात भी सराहनीय है। यदि हम कट्टरपन को समाप्त करने में सफल हुए तो भारत एक शक्तिशाली देश होगा, जिसका मुकाबला दुनिया में कोई भी नहीं कर सकेगा। पंथ निरपेक्षता ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है और इस ताकत को सुदृढ़ करना ही हमारा धर्म है।
-लेखक सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी हैं।





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