संपादकीय. सबकुछ साधने के चक्कर में अक्सर कुछ भी नहीं बच पाता। जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस सरकार की अकाल मृत्यु का पहला सबक यही है। काफी समय बाद इस राज्य में देश की मुख्यधारा की राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस की सरकार बनी थी। चार साल पहले कांग्रेस ने मुफ्ती मोहम्मद सईद की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ गठबंधन करके सरकार का गठन किया था।
इस गठबंधन को बहुत सहज-स्वाभाविक माना जा रहा था और पीडीपी के क्षेत्रीय पार्टी होने के बावजूद उसे राष्ट्रीय सरोकारों वाली पार्टी कहा जा रहा था। कांग्रेस ने उदारता दिखाते हुए मुफ्ती को पहले मुख्यमंत्री बनने देने का समझौता किया और इस तरह राज्य की अकेली सबसे बड़ी पार्टी नेशनल कांफ्रेस को सत्ता से दूर रखने में कामयाबी पाई।
लेकिन घाटी की राजनीति तक ही अपने को सीमित रखने वाली पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस जैसी परस्पर विरोधी राजनीतिक पार्टियों ने मिलकर कांग्रेस को अमरनाथ यात्रियों की सुविधा के लिए जमीन आवंटन के मामले में फंसा कर बगल हो गई।
हालांकि यह फैसला पूर्व की नेशनल कांफ्रेंस सरकार के समय हुआ था और बाद में उसके अनुपालन में पीडीपी के मंत्री भी बराबर के भागीदार थे। लेकिन हुर्रियत और दूसरे अलगाववादी गुटों के इस मुद्दे पर आंदोलित होने से डरकर पीडीपी सरकार से बाहर आ गई और मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद के फैसला वापस लेने के बावजूद वापस नहीं आई। सरकार इस स्थिति का ठीक से आंकलन नहीं कर सकी और जोड़तोड़ से सरकार बचाने की कवायद में जुटी रही।
गुलाम नबी आजाद कुछ भी कहें लेकिन इस विवाद के क्रम में जिस राजनीतिक अपरिपक्वता का परिचय दिया गया उससे उनकी सरकार और पार्टी की राजनीतिक साख, दोनों आहत हुई हैं। घाटी के लोग इस बात से नाराज हैं कि अपनी अधिकांश सीटें जम्मू क्षेत्र से जीतकर आने वाली कांग्रेस पार्टी ने एक कश्मीर विरोधी फैसला लागू करने की कोशिश की।
जबकि जम्मू के लोग इस बात से दुखी हैं कि जिस पार्टी को उन्होंने अपने यहां से जबरदस्त बहुमत प्रदान किया वह अंतत: उसके हितों की रक्षा नहीं कर सकी। राज्य की विशेष कानूनी स्थिति के तहत अब वहां चुनाव होने तक राज्यपाल का शासन रहेगा। लेकिन इस पूरे प्रकरण में आजाद सरकार गिरने से भी ज्यादा नुकसानदेह क्षेत्रीय और सांप्रदायिक आधार पर राज्य का भावनात्मक बंटवारा है। इस मुद्दे पर आगे होने वाली राजनीति इसे और खौफनाक बना सकती है।