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मिलावट की बड़ी मंडी

जोधपुर. adulterate खाद्य पदार्थो में मिलावट की रफ्तार से जोधपुर प्रदेश में मिलावट मंडी के रूप में अपना नाम दर्ज करवा चुका है। चिकित्सा विभाग की मिलीभगत से पनप रहे मिलावट के कारोबार की स्थिति यह है कि यह सब गुपचुप नहीं, खुले आम हो रहा है।

चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने फूड इंस्पेक्टरों के लिए एक वर्ष में खाद्य पदार्थो के सौ नमूने लेने का लक्ष्य तय कर रखा है। इस आधार पर गत पांच वर्षों में खाद्य पदार्थो के 500 नमूने लेने थे। जबकि जिले की हालत ये है कि गत पांच वर्षो में 311 नमूने ही लिए गए। इनमें से 142 नमूने फेल हो गए।

मजे की बात ये है कि इनमें से सभी आरोपियों के विरुद्ध फूड लैब की रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय में मामले दर्ज करवाने थे। इनमें से 20 मामलों में तो सेंपल ही सीएमएचओ कार्यालय से बाहर नहीं निकल सके और 122 मामलों में भी साक्ष्य नहीं होने के कारण मिलावटियों का बाल भी बांका नहीं हुआ। इस कारण मिलावट करने वालों के हौसले बढ़ते जा रहे हैं।

जनता को फायदा नहीं
लापरवाही बरतने वाले जोधपुर के तीन फूड इंस्पेक्टर को जयपुर एपीओ भी किया गया। इनमें से अधिकांश मामले वर्ष 2003 और 2005 के बीच पकड़े गए थे। इस कारण तत्कालीन सीएमएचओ को भी चार्जशीट दी गई लेकिन इस प्रशासनिक कार्रवाई के कारण मिलावट पर अंकुश लगाने में कारगर सिद्ध नहीं हो सकी।

अधिकारी सरकारी कार्रवाई में उलझे रहे और मिलावट का धंधा बेखौफ चलता रहा। इसका असर यह पड़ा कि तीन माह से जिले में एक भी फूड इंस्पेक्टर नहीं है। इस कार्रवाई के बावजूद आमजन के स्वास्थ्य को लेकर चिकित्सा विभाग ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए।

महालेखा परीक्षक की आपत्ति
जोधपुर में मिलावट को रोकने में की जा रही लापरवाही पर नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने आपत्ति जताई है। वर्ष 2005 में भेजे गए अपने नोटिस में महालेखा परीक्षक ने सीएमएचओ जोधपुर से जवाब मांगा था। इसका जवाब तो भेज दिया लेकिन यह नोटिस भी विभाग की बिगड़ी व्यवस्था को सुधारने में विफल रहा। अब भी मिलावट रोकने के पुख्ता बंदोबस्त नहीं हैं।

अधिकारी कोर्ट से कतराने लगे
परचून दुकानदार राम किशोर के यहां 1999 में मिलावट के संदेह पर छापा मारा गया। सेंपल फूड लैब भेजे। वहां मिलावट की पुष्टि हुई और मामला न्यायालय में पहुंचा। बाद में सीएमएचओ ने साक्ष्य के लिए सेंपल कोर्ट में नहीं भेजे।फूड इंस्पेक्टर को तीन बार न्यायालय ने बुलाया और गवाही देने को कहा,मगर वे कोर्ट गए ही नहीं।

22 जनवरी 2004 को अंतिम मौका भी दिया, लेकिन बिना कारण बताए सीएमएचओ और फूड इंस्पेक्टर फिर भी कोर्ट में पेश नहीं हुए। इस पर साक्ष्य को बंद करना पड़ा। न्यायालय ने आखिरकार आरोपी रामकिशोर को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया।

इस पर कोर्ट ने चिकित्सा निदेशालय को आदेश दिए कि फूड इंस्पेक्टर ओंकारचंद द्विवेदी और सीएमएचओ डॉ.एस.एस.गहलोत के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। इस पर विभाग ने फूड इंस्पेक्टर को एपीओ किया और सेवानिवृत्ति से ठीक पहले डॉ.गहलोत को चार्जशीट थमा दी। अन्य मामलों में आज भी चिकित्सा विभाग की इसी तरह की लापरवाही से आरोपी मिलावटखोर सजा से बच रहे हैं।

सीएमएचओ डॉ. जीएल चौधरी से बातचीत
प्र. मिलावट का धंधा पनप रहा है और चिकित्सा विभाग खामोश क्यों है?
डॉ. चौधरी-देखिए, पहले यहां कुछ मामलों में लापरवाही बरती गई। इस कारण फूड इंस्पेक्टरों को एपीओ किया गया।मैंने चार्ज संभालते ही फूड इंस्पेक्टर की मांग की है। इसे मान लिया गया है और शीघ्र ही यहां फूड इंस्पेक्टर लगेगा
प्र. टारगेट पूरे नहीं हो पा रहे हैं और तीन माह से तो मिलावटिए निरंकुश हैं?
डॉ. चौधरी-पहले की में नहीं बता सकता,ये तो पहले वाले सीएमएचओ ही बताएंगे।अब कोई मिलावट करने वाला विभाग से बच नहीं पाएगा। इन पर हर हाल में लगाम कसी जाएगी।





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