विकास मंत्र. जब कभी मैं अपने लोगों के घर जाता हूं तो सबसे पहले मेरे साथ जो बात होती है वह यह कि मैं वहां घर की तलाश करने लगता हूं। कारण, धीरे-धीरे अब घर विस्थापित होते जा रहे हैं।
मकानों ने, फ्लैटों ने और कोठियों ने उन्हें शहर निकाला दे दिया है। वैसे हैं तो ये भी घर ही क्योंकि यहां भी आखिर में अपने ही लोग तो रह रहे हैं लेकिन वहां वह एहसास नहीं मिलता, वह स्पंदन नहीं मिलता, वह गंध नहीं मिलती, जो किसी भी स्ट्रक्चर को घर बनाते हैं और सपाट सुन्न दीवारों में सीने की धौंकनी पैदा कर देते हैं।
जब कभी भी अपने लोगों के घर जाता हूं तो देखता हूं कि मुझे छोटा सा ही सही, लेकिन एक आंगन दिख जाए ताकि मैं सिर उठाकर खुले आकाश को और रात में आकाश में टंके चांद-सितारों को देख सकूं मेरी आंखें दीवारों को टटोलकर आलों को खोजने लगती हैं, जहां छोटी-मोटी चीजों को रहने का सहारा मिल जाया करता था। दीवारे अहंकारी व्यक्ति की तरह स्ट्रेट और सीधी तनी हुई दिखती है।
नजरें घुमाता हूं कि कहीं कोई ऐसी गुंजाइश दिखाई दे जाए ताकि मैं गोरैया को जाकर बता दूं कि वह वहां से घुसकर अपने घोंसले के लिए जगह का चुनाव कर ले। लेकिन गोरैया के घुस पाने की बात तो बहुत दूर की बात है हवा तक को घुसने के लाल पड़े रहते हैं। वहां ऐसे किसी के भी लिए अघोषित प्रवेश निषेध है।
अब ऐसी तंग जगहों पर रहने पर तंगदीली नहीं आएगी, तो क्या फकीरों को फांका मस्ती का सुरूर सुझेगा। यदि मेरे घर में किसी के लिए जगह नहीं है तो फिर किसी दूसरे के घर में मेरे लिए जगह क्यों चाहिए। फिर मुझे घर का रोना रोने का हक भी कहां रह जाता है।
-लेखक समय एवं जीवन प्रबंधन के विशेषज्ञ हैं।