हाल ही में मुझे न्यूजीलैंड की यात्रा करने का मौका मिला जहां एक कार्यक्रम में मैंने वहां रह रहे भारतीयों को अपने देश की खोज खबर लेते रहने की सलाह दी ताकि उनके बच्चे अपने बाप-दादा के देश से जुड़े रहें।
मेरी सलाह पर प्रवासी भारतीयों का कहना था कि ज्यादा छुट्टियां उनके पास होती नहीं और कम समय में ही कई जगहों पर जाना होता है। ऐसे में देश में कई जगहों पर किसी न किसी मुद्दे को लेकर आंदोलन होने के कारण वह बीच में ही फंसकर रह जाते हैं। सड़क और रेल मार्ग जाम होने से परेशान बच्चे दूसरी बार भारत जाने के नाम से ही घबराने लगते हैं।
उनका कहना गलत नहीं था। मुझे ऐसे कई प्रवासी दोस्तों की जानकारी है जो ऐसे आंदोलनों में फंसने के कारण समय पर हवाई अड्डे तक नहीं पहुंच पाए। ट्रेन रोको या चक्का जाम के कारण कई बार गंभीर रूप से बीमार लोग भी समय रहते अस्पतालों तक नहीं पहुंच पाते। कुछ समय पहले हिमाचल में एक ही दिन सत्तारूढ़ और विपक्षी दल ने प्रदर्शन किया था।
प्रदर्शनकारियों ने शिमला के मेडिकल कॉलेज में अपने बीमार बेटे को ले जा रहे एक व्यक्ति की गाड़ी नहीं निकलने दी थी। लाचार बाप बेटे को कंधे पर ही उठाकर चल पड़ा था लेकिन जब वह वहां पहुंचा, कंधे पर बेटा नहीं, उसकी लाश लटक रही थी। एक घटना बिहार की है जहां एक गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाया जा रहा था।
प्रदर्शनकारियों ने उनकी भी गाड़ी नहीं निकलने दी और हालत गंभीर होने के कारण वह चल नहीं पाई। दर्द से कराहती महिला ने धरनास्थल पर ही बच्चे को जन्म दिया था। मौके पर मौजूद महिलाओं ने अपने दुपट्टों से पर्दा कर उस महिला की मदद जरूर की मगर प्रदर्शनकारियों के चेहरे पर शर्म नदारद थी। एक मामला तमिलनाडु का है जहां भ्रष्टाचार के एक मामले में एक नेता की गिरफ्तारी के विरोध में कुछ लोगों ने छात्राओं से भरी बस फूंक दी थी। तब बिना किसी कसूर के छह छात्राओं के जिंदा जलने के बावजूद राजनीतिक नेता के उग्र समर्थकों के चेहरे पर शिकन तक नहीं थी।
न्यूजीलैंड से पहले कनाडा यात्रा के दौरान भी मेरे पास तब कोई जवाब नहीं था जब कांवड़ियों द्वारा तोड़फोड़ करने की खबर वहां पहुंची थी। तब एक हादसे में कुछ कांवड़ियों की मौत के बाद अन्य हिंसक हो उठे थे। वहां रह रहे भारतीय मूल के बच्चों का कहना था कि हादसे की जांच पुलिस को करनी चाहिए। पुलिस का रवैया उदासीन होने पर अदालत जाया जा सकता है लेकिन गाड़ियां फूंकने और रास्ते जाम करने का क्या औचित्य?
पंजाब में डेरा सच्च सौदा के प्रमुख का विरोध पहले राजनीति से जुड़ा था लेकिन बाद में इसने धार्मिक रंगत ले ली। शुरुआत में जब तीन-चार दिन तक प्रदर्शनकारियों ने नंगी तलवारें लेकर सड़कों पर प्रदर्शन किए तब बाहरी राज्यों से पंजाब आने वाले लोगों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज हुई थी।
कारण यह कि प्रदर्शनों में एक बार फंसने वाले लोग दूसरी बार वहां जाने से पहले कई बार सोचते हैं। मुंबई में डेरा सच्च सौदा प्रमुख के गनमैन द्वारा गोली चलाने के बाद एक बार फिर से पूरे देश में प्रदर्शनों और सड़क-रेल रोकने का सिलसिला शुरू हो गया। जम्मू-कश्मीर में अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जंगलात विभाग की भूमि दिए जाने के खिलाफ हो रहे हिंसक प्रदर्शनों ने अब तक कई लोगों की जान ले ली है। इस मामले को लेकर देश के अन्य भागों में भी अशांति हुई।
हमारे देश में अदालतों ने कई बार बंद के आयोजनों को गैर-कानूनी करार दिया है। किसी भी राजनीतिक दल के पास हड़ताल के आह्वान का अधिकार है लेकिन इसके लिए किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता। हड़ताल में शामिल होने या न होने का अधिकार लोगों के पास है लेकिन बंद का आह्वान करते वक्त संदेश यही दिया जाता है कि हड़ताल करें नहीं तो नतीजा भुगतने के लिए तैयार रहें।
संगठन संबंधित इलाके के लोगों को अपने हुक्म का गुलाम बनाने की कोशिश करते हैं। आम लोग विरोध करने से झिझकते हैं और बंद सफल हो जाते हैं। किसी भी सभ्य समाज के लिए यह सिलसिला ठीक नहीं। सभ्यता के मामले में हम जिन देशों से बराबरी का दावा करते हैं वहां जब-तब जबरन बंद नहीं होते।
अपनी हद में रहकर राजनीतिक पार्टियां और धार्मिक संगठन मर्यादा कायम रखते हैं। दो दलों के बीच किसी विवाद की सूरत में प्रशासन अपनी जिम्मेदारी बिना किसी दबाव के निभाता है। प्रशासन हमारे देश में भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह कर सकता है, बशर्ते राजनीतिक दबाव न पड़े। मौजूदा हालात में हम अपने घरों में चाहे जितनी बार ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ गा लें लेकिन बाहरी दुनिया तक वह संदेश नहीं पहुंचा पा रहे जिससे देश की छवि निखरे।
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।