दृष्टिकोण.
अमेरिका में बसने वाले भारतीयों तथा भारत-अमेरिका रिश्तों पर अमेरिकी कांग्रेस की समिति के सभापति गैरी आकरमेन आड़े वक्त में भारत का साथ देते रहे।
भारत सरकार ने वर्ष 2002 में पद्मविभूषण से सम्मानित कर गैरी के प्रति आभार प्रकट किया था। विरले विदेशी ही देश का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण असैनिक अलंकरण पाने के हकदार बने हैं। अमेरिका का सहयोग दिलाने के वादे के साथ भारत मित्र गैरी पहले भी तुरत-फुरत परमाणु करार पूरा करने तथा ईरान से नाता तोड़ने की शर्त पर जोर देते रहे हैं।
जिन दिनों प्रधानमंत्री तथा कांग्रेस सपा नेता मुलायम सिंह को सरकार बचाने के लिए राजी कर रहे थे, उसी वक्त आकरमेन डॉ मनमोहन सिंह से कह गए कि ईरान तक पाइपलाइन बिछाने की योजना भारत भूल जाए। चेतावनीनुमा सलाह पहले भी मिल चुकी है। भारत रवाना होने से पूर्व गैरी ने आश्चर्य प्रकट किया कि दुनिया के प्रमुख देश ईरान से आर्थिक सहयोग समाप्त कर रहे हैं जब कि पाकिस्तान होते हुए तेल पाइप लाइन बिछाने के नाम पर भारत ईरान में निवेश का द्वार खोल रहा है। जी-8 की बैठक से ठीक पहले लगता है प्रधानमंत्री ने सरकार तो बचा ली परन्तु गैरी की चेतावनी तलवार की तरह सिर पर लटकी है।
पिछले पखवाड़े अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश इसी तरह की उलझन में फंसे थे। लंदन पहुंचने पर बुश को अफगानिस्तान तथा इराक पर ब्रितानी नाराजगी दूर करने की खातिर सफाई की मुद्रा में आश्वस्त करना पड़ा कि ओसामा बिन लादेन जल्दी गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
बुश के ऐलान के चंद दिनों बाद अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सीआईए ने दावा ठोंका-ओसामा बहुत बीमार है। बस, कुछ महीनों का मेहमान। बुश दलदल में फंसे हैं। डेमोक्रेटिक प्रत्याशी बराक ओबामा की भावी विदेश नीति लगभग वैसी ही है जैसी बुश छोड़कर जा रहे हैं। इराक में शांति लाने की पहल कर ओबामा अमेरिकी जनता के बुश विरोधी गुस्से को समर्थन में बदलना चाहते हैं। अलबत्ता आतंकवाद से अमेरिकी नफरत को ईरान के खिलाफ मोड़ने में उनकी पार्टी को भी कोई उज्र नहीं है।
अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की होड़ के कारण ईरान में कुछ भी हो सकता है। अमेरिका के पत्रकार तथा युद्ध विशेषज्ञ अफगानिस्तान, इराक के बाद एक और हमले की आशंका व्यक्त करने लगे हैं। खबर तो यहां तक है कि मेक्केन की संभावित पराजय के पाप की जिम्मेदारी से उबरने के लिए बुश छद्मयुद्ध की तैयारी कर चुके हैं। ईरान में बगावत, सेना के अधिकारियों तथा राजनीतिक नेताओं पर हमले तथा हत्या की घटनाएं घट सकती हैं।
पत्रकार सैमूर हर्ष ने गहराई में जाकर पता लगाया कि अमेरिकी रक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स के विरोध के कारण राष्ट्रपति बुश ईरान में चमत्कार करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। बुश प्रशासन मानता है कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव का नजारा बदलने मेंईरान तुरुप का पत्ता साबित हो सकता है। हर्ष ने ही बरसों पहले खबर देकर चेताया था कि राष्ट्रपति बुश इराक पर हमले की तैयारी कर चुके हैं। खबर सही थी, इसलिए ईरान के बारे में उनके रहस्योद्घाटन पर अकारण अविश्वास नहीं किया जा सकता।
अमेरिकी नागरिकों को बचपन से राष्ट्रप्रेमी बनाया जाता है। युवाओं को सैनिक शिक्षा दी जाती है। घर-घर राष्ट्र ध्वज फहराने की आदत डाली जाती है। देश या व्यक्ति के अधिकार तथा स्वाभिमान पर आंच आते देख प्रतिकार करना उनकी आदत में शुमार हो चुका है। अमेरिका में आग्नेयास्त्र का लाइसेंस पाना कठिन नहीं है। शांतिप्रिय नागरिकों के संगठन हथियारों के लाइसेंस देने के नियम कड़े करने की मांग कर रहे हैं। रिपब्लिकन पार्टी के अधिकांश सदस्य हथियार हिमायती संगठनों को संरक्षण देते हैं।
वियतनाम तथा कोरिया युद्ध से अमेरिका की विजय गाथा नहीं लिखी गई थी। इसके बावजूद अमेरिका की राजधानी वॉशिंग्टन सहित देश के अनेक शहरों में वियतनाम तथा कोरिया युद्ध के स्मारक और संग्रहालय हैं। अफगानिस्तान तथा इराक में भारी सैनिक खर्च के बीच हिंसा के शिकार बनते अमेरिकी सैनिकों के कारण अमेरिकी चुनाव में आतंकवाद विरोध दुधारी तलवार बन गया है। कांटे से कांटा निकालने की अमेरिकी बारहखड़ी में अफगानिस्तान का ‘अ’ इराक का ‘इ’ पार करने के बाद ईरान का ‘ई’ निशाने पर है।
आतंकवाद विरोध के‘आ’ पर इसकी नींव रखी जाती है। इसके लिए अमेरिका को पाकिस्तान से अधिक भारत का समर्थन चाहिए। भारत के पश्चिम में पाकिस्तान को छोड़कर अमेरिका ने ईरान तक किसी देश पर भरोसा नहीं किया। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के मुखिया जरदारी ने एथेंस में सोशलिस्ट इंटरनेशनल की बैठक में अमेरिका तथा इंग्लैंड पर भड़ास निकालते हुए आरोप लगाया कि दोनों ताकतवर देश पाकिस्तान के सैनिक तानाशाहों की मदद करते रहे। आसिफ अली जरदारी ने चेतावनी दे डाली कि आतंकवाद का मुकाबला करने में पाकिस्तान असफल रहा तो पूरा विश्व भुगतेगा।
पाकिस्तान की छिपी चेतावनी भारत समझ रहा है। आकरमेन आकर कुछ भी कहें, पुराने सांस्कृतिक मित्र ईरान से मुंह मोड़ना भारत के लिए आसान नहीं है। इराक पर अमेरिकी हमले के समय भारत ने खामोशी साध ली। ईरान में अमेरिकी दखल का भारत के अंदरूनी हालात पर असर पड़े बगैर नहीं रहेगा। प्रधानमंत्री के सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन आकरमेन की भारत यात्रा के पूर्व चुपके-चुपके तेहरान हो आए हैं। लौटते ही उन्होंने तथा प्रधानमंत्री ने समाजवादी पार्टी के नेताओं को आश्वस्त किया कि अमेरिकी दबाव के बावजूद ईरान से आर्थिक या व्यापारिक नाता बना रहेगा।
सर्कस की सुंदरी की तरह सरकार को दोनों छोर संभालने हैं। प्रधानमंत्री भली-भांति जानते हैं कि ईरान भारत के लिए मात्र वोट बैंक का सवाल नहीं है। ईरान पर परमाणु करार जैसे दबाव से बचने के लिए विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी पुराने गुटनिरपेक्ष साथी मिस्र के प्रधान हुस्नी मुबारक का सहारा लेने जा पहुंचे।
दबावों की अनदेखी करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति बुश कार्यकाल समाप्त होने के पूर्व भारत से परमाणु करार की बाधाएं दूर करा लेना चाहते हैं। भारत की जी-8 और चुनावी परेशानियों से अमेरिकी चिंता अधिक बड़ी है। डेमोक्रेटिक उम्मीदवार ओबामा ने खुशी-खुशी करार का समर्थन नहीं किया था। अमेरिकी चुनाव हमें राहत देने वाला नहीं है।