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वामदलों की समर्थन वापसी

संपादकीय. पिछले कई महीनों से केंद्र सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामदल लगातार यह धमकी दे रहे थे कि यदि मनमोहन सरकार अमेरिका के साथ परमाणु करार के मुद्दे पर आगे बढ़ती है तो वे समर्थन वापस ले लेंगे।

इसलिए अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी में जल्दी जाकर भारत का पक्ष रखने के प्रधानमंत्री के बयान को बहाना बना कर वामदलों ने सरकार से हाथ खींच लिए। हालांकि सत्तारूढ़ सप्रंग ने मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी का समर्थन सुनिश्चित करके नुकसान की भरपाई कर ली है, लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस अधकचरे और अविश्वसनीय राजनीतिक प्रबंधन से सरकार के सामने पैदा हुआ अल्पमत होने का खतरा खत्म हो जाएगा।

अल्पमत या कार्यवाहक सरकार को किसी बड़े और महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौते के लिए नैतिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं माना जाता। इसलिए यदि मनमोहन सरकार सचमुच परमाणु करार करना चाहती है तो उसे ऐसा करने से पहले संसद में विश्वास मत प्राप्त करना पड़ेगा।

दिक्कत यह है कि वामदलों के 59 सांसदों की तुलना में सपा के पास केवल 39 सांसद हैं। इसमें से कई ऐसे हैं जो अमेरिका के साथ मधुर संबंधों को पसंद नहीं करते। यही वजह है कि जबसे सपा ने परमाणु करार पर सरकार को समर्थन देने की घोषणा की है तब से ही पार्टी के भीतर मतभेद और टूटफूट की अफवाहों का बाजार गर्म है। लेकिन यदि सपा का एकजुट समर्थन बरकरार रहता है तब भी सरकार को बने रहने के लिए कुछ अतिरिक्त सांसदों की दरकार रहेगी।

अनिश्चय और अफरातफरी के इस समय में सब कुछ सरकार के रणनीतिकारों के राजनीतिक कौशल पर निर्भर करता है। यह सही है कि पांच साल के लिए चुने गए किसी भी पार्टी के सांसद समय से पहले चुनाव में नहीं जाना चाहते, चुनावी परिसीमन लागू होने के बाद तो और भी नहीं! लेकिन पार्टी हितों के विरुद्ध जाने का साहस कम ही देखा जाता है।

देश की संसदीय राजनीति में परमाणु करार के रूप में पहली बार कोई अंतरराष्ट्रीय मुद्दा किसी सरकार के अस्तित्व की कसौटी बना है। सत्तारूढ़ कांग्रेस और उसे अब तक समर्थन दे रहे वामदल इस मामले में एक-दूसरे के सामने हैं। देखना यह है कि मुख्य विपक्षी दल भाजपा इसे चुनावी मुद्दा किस तरह बनाएगी।





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